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किशोर मन ….किशोर मन ….

29 सित

 

सहस्त्र जन , सहस्त्र मन,

एक ही परिसीमन  |

पदों कि चाप , नुपुर कि छन्न ,

                                 किशोर मन….., किशोर मन ….

सहस्त्र कंठ , सहस्त्र ताल,

मचल उठे अशंख्य भाल |

उमंग से धड़क उठा ,

कोटि कोटि स्वर फूटा | |

भाव  बने गान फिर ,

कल्पना बनी सृजन | |

                           किशोर मन ….. किशोर मन ….

उमंगों कि घटा घनी,

सहस्त्र रागिनी छनी |

प्रखर, प्रचंड तेज है ,

सुरों में एक ओज है |

धड़क रहा हृदय हृदय,

थिरक रहा हर एक तन  | |

                               किशोर मन…  किशोर मन ….

पवित्र हो गयी धरा,

हुआ है देव आगमन  |

क्षितिज के एक छोर पर ,

ठहर के देखो सूर्यरथ  |

निहार अपलक रहा ,

विभूतियों का ये मिलन | |

                             किशोर मन … किशोर मन ……

-उपेन्द्र दुबे

 

About उपेन्द्र दुबे

Working as Software Engineer in Samsung India Pvt Ltd.
16 Comments

Posted by on सितम्बर 29, 2011 in कविता [Poetry]

 

टैग:

16 Responses to किशोर मन ….किशोर मन ….

  1. anu

    सितम्बर 29, 2011 at 9:49 अपराह्न

    मन का शब्द शब्द …गुनगुना उठा …बेहद खूबसूरत प्रस्तुति

     
  2. somkritya

    सितम्बर 29, 2011 at 9:53 अपराह्न

    Absolutely wonderful…kya khoob likha hai you are so rich of words

     
  3. hsonline

    सितम्बर 29, 2011 at 9:56 अपराह्न

    यार मज़ा आ गया!!! याद है दुबे? अपने कॉलेज के वार्षिकोत्सव के लिये तुमने ये कविता लिखी थी। साक्षी हूँ उस लेखन का। और इस कविता का पहला पाठक भी!!!

    मेरी नज़र में यह तेरी सबसे सुंदर कविता है। अब तक की सबसे सुंदर।

     
  4. kvspeaks

    सितम्बर 29, 2011 at 10:04 अपराह्न

    mahan kavita. bhav vibhor kar diya upendra bhai aapne.

     
  5. उपेन्द्र दुबे

    सितम्बर 29, 2011 at 10:04 अपराह्न

    कविता सुन्दर है या नहीं यार पर तुझे याद है न वो पल ….वो बड़े सुन्दर थे …भले ही कितने धुप छावं आये पर फिर भी आज तक ये बंधन ज्यूँ का त्यूं लगता है

    और वो स्थापक सर की सलाह कादम्बनी में छपवाओ …..पर आज तक नहीं छपी कादम्बनी में …..पर कादम्बनी से ज्यादा अनमोल हैं वो पल

    …फिर पूछता हूँ …क्या नहीं लौट सकता वो मदमस्त जीवन फिर से ?…
    बता भाई हितेंद्र ……लौटा दे मेरे वो बीते हुए पल …

     
  6. hsonline

    सितम्बर 29, 2011 at 10:09 अपराह्न

    कहाँ से लाऊँ वो दिन मित्र!

    तू बस लिखता जा, इस ब्लॉग पे अमर हो जाएँगे वो पल। असल दुनिया का नहीं जानता। लेकिन पढ़ के ही सही उन पलों को जी लेंगे। लिखता जा बस तू!

     
  7. Dr.ManojMishra

    सितम्बर 29, 2011 at 10:15 अपराह्न

    बहुत सुंदर.

     
  8. Naveen Yadav

    सितम्बर 30, 2011 at 11:46 पूर्वाह्न

    Aati sundar kavita .

     
  9. Nitesh Kumar

    सितम्बर 30, 2011 at 12:53 अपराह्न

    आप की रचना काफि उम्दा है और इस रचना मे काफि गहराई है

     
  10. induravisinghj

    सितम्बर 30, 2011 at 1:38 अपराह्न

    अद्भुत,अद्भुत,अद्भुत…
    गज़ब का अभिव्यक्तिकरण है। उपेंद्र जी आपका आभार इतनी खूबसूरत रचनाएं हमें देने के लिए…
    यूँ ही लिखते चलिए…

     
  11. Yashwant Mathur

    दिसम्बर 10, 2011 at 2:01 अपराह्न

    गजब का लिखते हैं सर!
    सोमा जी से आपके ब्लॉग का लिंक मिला। अब यहाँ आना होता रहेगा।

    सादर

     
  12. दिनेश मिश्र

    दिसम्बर 10, 2011 at 2:14 अपराह्न

    sundar abhivyakti………………….!!

     
  13. Yashwant Mathur

    दिसम्बर 11, 2011 at 12:21 अपराह्न

    कल 12/12/2011को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

     
  14. Sangeeta Swarup

    दिसम्बर 12, 2011 at 10:04 पूर्वाह्न

    बहुत सुन्दर भावों को संजोये खूबसूरत रचना … हर शब्द संगीत सा बज उठा ..

     
  15. sushma verma

    दिसम्बर 12, 2011 at 11:16 अपराह्न

    सुंदर अभिव्यक्ति..

     
  16. Yashoda Agrawal

    फ़रवरी 20, 2012 at 7:28 पूर्वाह्न

    शब्द और संगीत दो अलग वजूद……………..
    और जब दोनों मिलें तो दिखा उपरोक्त स्वरूप

     

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