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Monthly Archives: जनवरी 2012

मटमैली बारिश की बातें…

परियों की उलझी आँखों में, उलझा कल कुछ दूर चला |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

बूदों की टप टप सड़कों पर |

छत मुंडेर और गली घरों पर | |

उछल कूद काले मेघों की |

बरखा थी थोडा शरमाती  | |

डालों पे पत्ते हिलते थे |

पुष्प नहाने को खिलते थे | |

गरज लगी ढोलों की थपथप |

खिंच रही चितवन थी बरबस | |

बूदों में शरगम बनते थे |

गलियों में उपवन खिलते थे | |

क़दमों की छपछप में खो मन, मतवाला कल डूब चला |

मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

बूंदों ने संधि थी कर लीं |

बनी धार बंदी बन भर लीं | |

नालों में उफान तब आई |

दीवारें थोडा सकुचाई | |

सोचा बाँध नहीं पाऊँगी |

आज भला कैसे गाऊंगी | |

चला कारवां बूंदों का फिर, गति अनंत एक तड़प लिए |

मिलने को सरिता भी व्याकुल प्रेम पाश की फडक लिए | |

व्याकुलता संगीत बनी तब लय जीवन का भरती थी |

सच कहता हूँ प्रणव चाल कुछ मय जैसी ही लगती थी | |

दीवारें थामे थीं सबको, प्रेम अंश उन्माद लिए  |

एक बूँद भी बिछड न जाये, यत्न यही संवाद दिए | |

 

प्रीत पनपती देख दिलों में, रीत जगत निर्मूल खड़ा  |

मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला  | |

 

और सुनो तुमको बतलाऊँ ……

 

कुछ बातें जो छूट रहीं थीं |

उस पल का रस लूट रही थीं | |

उनके शब्द शब्द कहता हूँ  |

भावों का विनोद कहता हूँ  | |

कुछ बूँदें जो टूट रहीं थीं |

पंखों से जो छूट रहीं थीं | |

घुल समीर की मंद छुवन में, यत्र तत्र सर्वत्र चलीं थीं |

उस बयार की मादक मधु ने, जीवन का सन्दर्भ चुनी थीं | |

 

भीगा था मन, तन भीगा था |

सारा जग, जीवन भीगा था | |

यौवन की गर्माहट भीगी |

जीने की आहट भी भीगी | |

नगर द्वार नर नारी भीगे |

मन दर्पण खुद वारी भीगे | |

मस्त मधुर संसर्ग चढा था |

विधि ने क्या कल स्वर्ग गढा था ??

 

मैं यूँ ही चुपचाप खड़ा था |

गगन छोर पर चैन पड़ा था | |

घुल बूदों संग सतत बरसता |

तभी धरा कल स्वर्ग सा सच था | |

 

अवनी और अम्बर की लगी में, भरम सिसकता दूर पड़ा |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

नयनों के इस नरम कोर पर , फिर भी बूँदें क्यूँ आती थीं |

जब भीगा जीवन जग में था , क्यूँ कपोल पर ढल जाती थीं | |

घुल बारिश की बूंदों में ,सहसा कल यूँ ही खो जाती थीं |

अकुलाहट कुछ तो अजीब थी, क्यूँ यूँ ही तब रो जाती थीं | |

शायद नहीं मिला था उनको |

मीत भिगोने वाला पल में | |

अपना यूँ अस्तित्व मिटा कर |

रोती जाती थीं कल जल में | |

उन बूदों की उहापोह में, घुल जीवन का सत्व चला |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

–उपेन्द्र दुबे

२८/०१/२०१२

 

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एक सांझ ….

कल पर्वत के पार वही, एक सूरज दौड़ा जाता था |

किरणों की चटकार गगन पर, सहसा छोड़ा जाता था | |

मातम का संगीत परिंदे, चिचिया कर दोहराते थे |

फड़फड़ की बेचैनी भी, पंखों में बसते जाते थे | |

क्यूँ उधार का रंग ओढ़, कल सांझ बहुत इठलाई थी ?

वो प्रहर भी तो ना बीत सका, जब रात दौड कर आई थी | |

रंगों की वो डली यहाँ कल, ऐसे लुटती जाती थी |

धूसर मेघों की श्यामलता, रंगों में सिमटाती  थी | |

दुल्हन सा माधुर्य लुटा था |

यौवन का चातुर्य छुटा था | |

धकियाती कल रात प्रवर थी |

अंधियारी वो बात प्रखर थी | |

उहापोह के आँगन में वो, किरणें क्यूँ सिसियाती थी ?

क्यूँ भविष्य भी वर्तमान में, मिलने को बौराती थी ? ?

क्यूँ मलिन पर्वत का सर, यूँ चमक लिए इतराता था ?

क्यूँ समीर यूँ शांत भाव से, बहते भी टकराता था ? ?

वन में वृक्षों की मस्ती भी, कोलाहल बन क्यूँ बिखरी थी ?

क्यूँ बदरी की बूंदों में, हालाहल घुल कर उतरी थी ?

कलकल निर्झर का गीत भी क्यूँ, क्रंदन अरुणोदित लगता था ?

क्यूँ पाहन तट के संबल बन, मन भी अनुमोदित करता था ? ?

स्वप्न साज बन क्यूँ प्रपंच, मन में  मादकता भरती थी ?

क्यूँ अकुलाती वो प्यास वहीँ, तट पर रहकर ना बुझती थी ? ?

कल रात वहीँ निर्झर तट पर, मैंने लहरों से बातें की |

गीले उस रेत के दामन में, कुछ आढ़ी तिरछी रेखा दी | |

वो चंद लकीरें मिल कर के, एक नन्हा खाका खिंच गयीं |

थी सुबह धुप की फिक्र किसे, वो तो थी अँखियाँ भींच गयीं | |

–उपेन्द्र दुबे

१३/०१/२०१२

 

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कैसी वो थी रात…..

कहीं दूर एक पल को, धडकन थमी थी |

कहीं रात सूरज की, किरणें जगीं थी | |

कहीं दूर चिड़ियों ने, छोड़ा बसेरा |

अंधेरों की चादर में, लिपटा  सबेरा | |

 

कहीं रात मद्धम सा, झोंका हवा का |

नयन छेड़ हौले से, खोला झरोखा | |

कहीं रात आँगन में, रुनझुन नुपुर की |

वो चुपके से आँचल थी, छू गयी किसी की | |

 

किसी की नरम सी, हथेली सी थी वो |

उसी पल को आई, सहेली सी थी वो | |

गुम थी ख्यालों में, वो खुशनुमा सी |

मीठी कहानी हो, जैसे सुनाती | |

 

कहीं रात निन्दियों ने, लोरी सुनाई |

नन्हे सुबह को, थपक कर जगाई | |

अंधेरों की गुनगुन थी, चांदी सी रातें |

बनी ख्वाब मन में, संजोने को बातें | |

 

कैसी वो थी रात, दिन को जगा गयी |

किसकी वो थी बात, सपने सजा गयी | |

चलो जिंदगी को, सबेरा बना लें |

उसी रात में अपनी, दुनिया बसा लें | |

मिले जिस डगर पर, सुबह सांझ तुमसे |

चलो उस डगर पर , घरोंदा सजा ले | |

 

 

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