परियों की उलझी आँखों में, उलझा कल कुछ दूर चला |
मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |
बूदों की टप टप सड़कों पर |
छत मुंडेर और गली घरों पर | |
उछल कूद काले मेघों की |
बरखा थी थोडा शरमाती | |
डालों पे पत्ते हिलते थे |
पुष्प नहाने को खिलते थे | |
गरज लगी ढोलों की थपथप |
खिंच रही चितवन थी बरबस | |
बूदों में शरगम बनते थे |
गलियों में उपवन खिलते थे | |
क़दमों की छपछप में खो मन, मतवाला कल डूब चला |
मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला | |
बूंदों ने संधि थी कर लीं |
बनी धार बंदी बन भर लीं | |
नालों में उफान तब आई |
दीवारें थोडा सकुचाई | |
सोचा बाँध नहीं पाऊँगी |
आज भला कैसे गाऊंगी | |
चला कारवां बूंदों का फिर, गति अनंत एक तड़प लिए |
मिलने को सरिता भी व्याकुल प्रेम पाश की फडक लिए | |
व्याकुलता संगीत बनी तब लय जीवन का भरती थी |
सच कहता हूँ प्रणव चाल कुछ मय जैसी ही लगती थी | |
दीवारें थामे थीं सबको, प्रेम अंश उन्माद लिए |
एक बूँद भी बिछड न जाये, यत्न यही संवाद दिए | |
प्रीत पनपती देख दिलों में, रीत जगत निर्मूल खड़ा |
मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला | |
और सुनो तुमको बतलाऊँ ……
कुछ बातें जो छूट रहीं थीं |
उस पल का रस लूट रही थीं | |
उनके शब्द शब्द कहता हूँ |
भावों का विनोद कहता हूँ | |
कुछ बूँदें जो टूट रहीं थीं |
पंखों से जो छूट रहीं थीं | |
घुल समीर की मंद छुवन में, यत्र तत्र सर्वत्र चलीं थीं |
उस बयार की मादक मधु ने, जीवन का सन्दर्भ चुनी थीं | |
भीगा था मन, तन भीगा था |
सारा जग, जीवन भीगा था | |
यौवन की गर्माहट भीगी |
जीने की आहट भी भीगी | |
नगर द्वार नर नारी भीगे |
मन दर्पण खुद वारी भीगे | |
मस्त मधुर संसर्ग चढा था |
विधि ने क्या कल स्वर्ग गढा था ??
मैं यूँ ही चुपचाप खड़ा था |
गगन छोर पर चैन पड़ा था | |
घुल बूदों संग सतत बरसता |
तभी धरा कल स्वर्ग सा सच था | |
अवनी और अम्बर की लगी में, भरम सिसकता दूर पड़ा |
मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |
नयनों के इस नरम कोर पर , फिर भी बूँदें क्यूँ आती थीं |
जब भीगा जीवन जग में था , क्यूँ कपोल पर ढल जाती थीं | |
घुल बारिश की बूंदों में ,सहसा कल यूँ ही खो जाती थीं |
अकुलाहट कुछ तो अजीब थी, क्यूँ यूँ ही तब रो जाती थीं | |
शायद नहीं मिला था उनको |
मीत भिगोने वाला पल में | |
अपना यूँ अस्तित्व मिटा कर |
रोती जाती थीं कल जल में | |
उन बूदों की उहापोह में, घुल जीवन का सत्व चला |
मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |
–उपेन्द्र दुबे
२८/०१/२०१२

sanjaydixitsamarpit
जनवरी 28, 2012 at 10:04 अपराह्न
सुन्दर ,बहुत सुन्दर ,आपकी कविता में स्वयं को भीगता हुआ देख सकता हूं, यादों को कुरेदती सी एक सुन्दर कविता के लिए आपको बधाई
induravisinghj
जनवरी 28, 2012 at 10:04 अपराह्न
नयनों के इस नरम कोर पर , फिर भी बूँदें क्यूँ आती थीं |
जब भीगा जीवन जग में था , क्यूँ कपोल पर ढल जाती थीं | |
Bahut hi sunder bhavmayee prastuti….
sangeeta swarup
जनवरी 28, 2012 at 10:18 अपराह्न
भावों को बहुत सुंदरता से सजाया है .. मधुर गीत बन पड़ा है ..
Yashwant Mathur
जनवरी 29, 2012 at 11:01 पूर्वाह्न
मैं यूँ ही चुपचाप खड़ा था |
गगन छोर पर चैन पड़ा था | |
घुल बूदों संग सतत बरसता |
तभी धरा कल स्वर्ग सा सच था | |
बहुत ही खूबसूरत लिखे हैं सर!
सादर
Yashwant Mathur
जनवरी 29, 2012 at 11:03 पूर्वाह्न
कल 30/01/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
धन्यवाद!
anju (anu)
जनवरी 29, 2012 at 11:53 पूर्वाह्न
भीगा था मन, तन भीगा था |
सारा जग, जीवन भीगा था | |
यौवन की गर्माहट भीगी |
जीने की आहट भी भीगी | |
नगर द्वार नर नारी भीगे |
मन दर्पण खुद वारी भीगे | |
मस्त मधुर संसर्ग चढा था |
विधि ने क्या कल स्वर्ग गढा था ??………………वाह बहुत खूब
मटमैली बारिश में …हर किसी के भीगने का मकसद और अनुभव अलग अलग ही होता हैं
vandana gupta
जनवरी 30, 2012 at 11:35 पूर्वाह्न
बहुत खूबसूरत भावाव्यक्ति।
parganiha
जनवरी 30, 2012 at 3:46 अपराह्न
सुन्दर ,बहुत सुन्दर.
rasprabha
जनवरी 30, 2012 at 4:07 अपराह्न
क़दमों की छपछप में खो मन, मतवाला कल डूब चला |
मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला | |
बहुत ही बढ़िया
punam
जनवरी 30, 2012 at 4:19 अपराह्न
प्रीत पनपती देख दिलों में, रीत जगत निर्मूल खड़ा |
मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला | |
sundar…
Balbir Rana
जनवरी 30, 2012 at 8:02 अपराह्न
नयनों के इस नरम कोर पर , फिर भी बूँदें क्यूँ आती थीं |
जब भीगा जीवन जग में था , क्यूँ कपोल पर ढल जाती थीं | |
घुल बारिश की बूंदों में ,सहसा कल यूँ ही खो जाती थीं |
अकुलाहट कुछ तो अजीब थी, क्यूँ यूँ ही तब रो जाती थीं | |
Bahut Sundar Upendra jee aapki kavitayen vastwikta ko jiwant karti hai …… so nice aur saabhar.
डॉ. रामकुमार सिंह
जनवरी 31, 2012 at 1:37 अपराह्न
शब्द सिर्फ उलझे ही नहीं, पार्श्व भी अधिक श्याम है आपके पन्ने को पढते हुए कठिनाई हो रही थी, कविता का शब्दचनयन निश्िचत ही उल्लेखनीय है। आपके पन्ने पर आकर अच्छा महसूस हुआ, उम्मीद है आप मौलिकता, रचनात्मकता और स्वस्थ तार्किक बहस को प्रमुखता देते रहेंगे, ‘सर्जना’ पर आइये…….आपका – डॉ. राम
Aman Beriwal
फ़रवरी 6, 2012 at 11:56 अपराह्न
bahut sunder upender ji
Ranjan Zeherila
फ़रवरी 15, 2012 at 11:17 अपराह्न
Waah waah Dubey ji..aap apni pratishtha ke anurup hi likhe jaa rehe hain..waah waah maza aa gaya