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अधूरा साथ प्यार में …


नयन उलझ नयन चले,

हया की रात ढल चले |

प्रणय की वेदना का स्वर,

जो देह में हुआ प्रखर | |

तो काल रात कुछ कही,

अनंत साथ बतकही |

दो देह भावना लिए,

कभी नहीं जो कुछ दिए | |

नजर झुकी हुई मिली,

उठी नजर से मिल खिली |

कपोल कसमसाते थे,

अधर भी कंपकंपाते थे | |

न जानती थी वो उसे,

थी दे रही थी सब जिसे | |

ये लाज आज बोलेगी,

या साज बन के खोलेगी |

न ज्ञान था प्रयाण का,

न ध्यान स्वाभिमान का | |

उतर रहे थे वस्त्र वस्त्र,

बिखर धरा पे यत्र तत्र |

दो नग्न देह मिलने को,

विकल हुए थे खिलने को | |

था डर कहीं समा रहा,

कहीं उमंग छा रहा |

कसी थी बाहुपाश में,

वो साथी  था प्रयास में | |

दो हाथ रेंगने लगे,

बदन से खेलने लगे | |

खनक  वो चूडियों की फिर, बिखर कहीं पे खो रही |

वो सिसकियाँ, कराह सब, मिलन के बीज बो रही | |

जो लौ बुझी थी दीप की,

बदन जला था भाव में |

जो अंग अंग से मिले,

मचलती धुप छांव में | |

वो पायलों की छन छनन, उतर जमीन पर गिरे |

थी घायलों सी वो व्यथा, जो शब्द मौन से मिले | |

रति घुली थी श्वेद में,

रिचाओं सी वो वेद में |

हवन सा साथ जल रहा,

आहूत को मचल रहा | |

अनंत व्याकरण गढे, वो साँसों की चढान पर |

बनी अतृप्त सी कथा ,वो रात की ढलान पर | |

 

वो कुछ पलों की बात थी,

बुझी बुझी सी आग थी |

था साथी अब भी जल रहा,

न मीत पर उबल रहा | |

निढाल एक छोर पर,

वो चादरों की ओट धर |

थका सा अधमरा हुआ,

मिलन था कुछ पड़ा हुआ | |

न धक् से द्वार काल का,

खुला कभी इति में ही |

जो धैर्य की सीमा लंघी,

रति वहाँ रही नहीं | |

अनल के द्वार पर तरल,

था सुस्त, साधना प्रबल |

वो पल की बात लुट चली,

लुटी सी वो तनिक लगी | |

वो रात थी सुहाग की,

उजडती सी वो फाग थी |

न रंग के तरंग में ,उमंग फिर से जल सका |

न यौवना के अंग में, प्रसंग फिर से सज सका | |

वो रात रोज आती है,

लुटी लुटी सी जाती है |

वो मन न शांत होता है,

वो साथी अब भी रोता है | |

जो मन के द्वार खोलेगी, व्यथा मिलन अतृप्त की |

अनेक त्रिज्य जल उठेंगे, उस अधूरे वृत्त की | |

उठेगा उसे से जो धुआं, उसे ही घेर जायेगा |

धधक वो मन की सह भी ले, कलुष मगर सताएगा | |

सवाल खोते जाते हैं,

समाज की दरार में |

ये बंधनों के वास्ते,

अधूरा साथ प्यार में | |

ये बंधनों के वास्ते, अधूरा साथ प्यार में …

 

–उपेन्द्र दुबे

१५/०४/२०१२

 
3 Comments

Posted by on अप्रैल 14, 2012 in कविता [Poetry]

 

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टीटही और चकोर…


कल भी नभ पर तारों का झुण्ड,

छिपमछिपाई खेल रहा था |

आसमान से दूर ओट में,

चंदा गुमशुम झेल रहा था | |

अलसाई कुछ पस्त पवन थी |

तन्हाई कुछ मस्त मगन थी | |

पग बोझिल, गरमी के दिन थे |

नैनों में कुछ आंसू कम थे | |

 

कदम सीढियों से जीने के |

छत पर थे बरबस जा पहुंचे | |

 

तब टीटही  चकोर से बोली |

सुन सुनाऊँ तुझको हमजोली | |

 

तू ये जो टकटकी लगाये, चंदा की है बाट जोहता |

क्या है ऐसा उस टुकड़े में, जो तेरा यूँ मन है मोहता ???

कुछ दिन में सावन बरसेगा |

तन मन और यौवन हरसेगा | |

मादकता मेघों में घुलकर, वसुधा का मनुहार भरेगी |

कुछ बच कर नभ के टुकड़ों में, चंदा का श्रींगार करेगी | |

धवल प्रियतमा के आँचल में, दुबक तुझे फिर नहीं तकेगा |

तू यूँ ही चितवन संग पगले, विरह प्रीत क्या ऐसे सहेगा ???

सच कहती हूँ….

 

मैं गाऊंगी तू निहारना |

चंदा को तू छोड़ ताकना | |

खुशियों की डफली ठोकेंगे |

नहिं कभी ऐसे रूठेंगे | |

 

तब चकोर ने नज़र घुमाई |

मंद मंद पहले मुस्काई | |

रे टीटही …

रे टीटही तू ना समझेगी |

ज्वार अगन की क्या परखेगी ??

सावन जो तू नाप रही है, नम समीर की बोझलता से |

नैनों के आंसू घुल गए हैं, बरसेंगे कल समरसता से | |

प्रीत देह की नहीं रे टीटही , जीवन का रसरंग छुपा है |

मधुबन के आँगन में रहती, क्या उसमे ही स्वर्ग बसा है ??

 

सुन बतिया मेरा मन डोला |

धीरे से मुझसे फिर बोला | |

यूँ मुट्ठी में रेत बांध

क्यूँ नाहक परेशान किया है ??

यूँ घुट के छत पर चलने से |

क्या जीवन वरदान हुआ है ????

सच कहती हूँ , चल चलते हैं …

 

चल चिड़ियों के पंख पकड़ हम, दूर गगन तक हो कर आयें |

चल तितली का रंग ओढ़ हम, फूलों में कुछ यूँ छुप जायें | |

इन्द्रधनुष के सात रंग में ,

हम अपनी खुशियाँ ढूँढेंगे |

तू कुछ रंग जेब में भरना, मैं कुछ से मुट्ठी भर लूँगा |

कुछ फिर भी बाकि गर बच गए ,

दोनों ओढ़ साथ चल देंगे | |

रात चढेगी वहाँ सांझ जब,

हम दोनों तारे तोड़ेंगे |

चंदा संग बदरी में छुपकर,

खूब देर तक हम खेलेंगे | |

गर तुझको जो ठण्ड लगेगी, बादल के फाहे ओढेंगे |

रात वहीँ रुक हम दोनों फिर, कहीं गगन में छुप सो लेंगे | |

सुबह सूर्य की कुछ किरणें ले |

फिर हम वापस घर लौटेंगे | |

घर रौशन होगा तारों से,

दीवारें किरणों से होंगी |

फिर टीटही  चकोर की बोली,

नहीं सुनेंगे हम हमजोली | |

फिर टीटही चकोर की बोली, नहीं सुनेंगे हम हमजोली ….

–उपेन्द्र दुबे (०५-०४-२०१२)

 
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Posted by on अप्रैल 5, 2012 in कविता [Poetry]

 

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रंग काटते हैं गर, तो मैं तुम्हे भी क्या रंगू …


यह गीत मेरी आवाज में आप इस गीत को मेरी आवाज में सुनने के लिए दिए लिंक पर click करें …

रंग अंग से लगे तो,
बात बन गयी नयी |
जिन्दगी का रंग देखो,
खो गया यहीं कहीं | |
आज ढूंढता हूँ मैं, दीवारों की कगार पर |
सूने मन की बेबसी , उम्मीदों की बहार पर | |

रंग आस छोड़ते हैं ,
आज कल करार पर |
सौदों की गली रंगी है,
आज द्वार द्वार पर | |

भेजूं मैं कहाँ, किसे?
की हर गली में शोर है |
आज प्रीत खो गयी है,

वास्तों का जोर है | |

बस उम्मीद है रंगी,
कफ़न कहीं लपेट कर  |
जल रही है होलिका,
हरेक सांझ पेट पर | |

राख पेट की उड़े जो,  कल सुबह समेट कर  |
क्या कहूं मैं होली है ये, जिंदगी की भेंट पर | |

गर ये भेंट रंग गयी तो, होली भी बवाल है
खुशनुमा है रंग या, ख़ुशी भी एक सवाल है?

कुछ अजीब रंग की, बिखरती आज होली है |

कहीं पे रंग रही कबर, कहीं पे सांझ रोली है | |

भेंट रंग गयी अगर तो, जिंदगी खरीद है |

रंग बिक रहे हैं आज, होली हुई गरीब है | |

राख पेट गाल पर, मलूँगा रोज सांझ को |

खुशियों से भरी ये जिंदगी, जनेगी बाँझ को | |

लोग जायेंगे सिमट, ये रंग कारोबार में |

नाप तौल से भरी, खुशी बिकी बाजार में | |

रंग काटते हैं गर, तो मैं तुम्हे भी क्या रंगू |

कांट छाँट कर ये रंग, जिंदगी में क्या भरूं | |

दूं मुबारकों भरी, या भावना की पाती मैं |

किस खुशी की व्यंजना, जो खुश नहीं हूँ साथी मैं | |

–उपेन्द्र दुबे

०८/०३/२०१२

 

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मैं भेज रहा हूँ तुमको, तुम भी मुझको होली भेजो…


कल रंगों की क्यारी में,
न जाने कितने ही रंग खिलेंगे ?
उस नन्हे सिमटे आँगन में,
न जाने कितने ही रंग गिरेंगे ?
दहलीज़ रंगी होगी कुछ से,
कुछ से दीवारें रंग जाएँगी |
कुछ हथेलियाँ गालों पर तो,
कुछ तुमको भी नहलायेंगी | |

ये रंग पर्व की बात तुम्हारा,
मन मटमैला करती होगी |
जब यादों की नन्ही गुडिया,
श्वेत तर्जनी धरती होगी | |
रोती होगी तुम भी छुपकर,
कमरे के उस कोने में |
जब गुलाल की डली बिखरती,
होगी स्वप्न सलोने में | |

पर दूर यहाँ इस दामन में,
क्या कम यादें बिखरेंगी ?
क्या ये रंग उनसे कम होगा,
जो तुमको कल रंग देंगी ?

उन रंगों की खातिर मुझको,
इस बार वही होली भेजो |
उन यादों में लिपटी उन्हीं,
रंगों की एक डोली भेजो | |

मैं भेज रहा हूँ तुमको , तुम भी मुझको होली भेजो ….

आज यहाँ पर उसी डगर पर,
खड़ा दूर अपने घर से |
नैना हैं किस पर टिकी हुई,
रंग ढूंढ रहीं जाने कब से | |
खाली पिचकारी हाथों में,
अब भी रंगों को तरसे है |
ये दामन ही क्यूँ कोरा है,
जब शहर में सब रंग बरसे हैं ??

इन रंगों से क्या नाता है ?
कोई रंग कहाँ अब भाता है?
छूट गयी अपने रंग की,
वो पिचकारी उन हाथों में |
उन मीठी बिसरी बातों में ,
वो दूर वहीँ उन साथों में | |

उन हाथों की शौगंध तुम्हें, इस बार वही रोली भेजो
मैं भेज रहा हूँ तुमको, तुम भी मुझको होली भेजो

–उपेन्द्र दुबे

रंगपर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएं…..

 

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मटमैली बारिश की बातें…


परियों की उलझी आँखों में, उलझा कल कुछ दूर चला |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

बूदों की टप टप सड़कों पर |

छत मुंडेर और गली घरों पर | |

उछल कूद काले मेघों की |

बरखा थी थोडा शरमाती  | |

डालों पे पत्ते हिलते थे |

पुष्प नहाने को खिलते थे | |

गरज लगी ढोलों की थपथप |

खिंच रही चितवन थी बरबस | |

बूदों में शरगम बनते थे |

गलियों में उपवन खिलते थे | |

क़दमों की छपछप में खो मन, मतवाला कल डूब चला |

मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

बूंदों ने संधि थी कर लीं |

बनी धार बंदी बन भर लीं | |

नालों में उफान तब आई |

दीवारें थोडा सकुचाई | |

सोचा बाँध नहीं पाऊँगी |

आज भला कैसे गाऊंगी | |

चला कारवां बूंदों का फिर, गति अनंत एक तड़प लिए |

मिलने को सरिता भी व्याकुल प्रेम पाश की फडक लिए | |

व्याकुलता संगीत बनी तब लय जीवन का भरती थी |

सच कहता हूँ प्रणव चाल कुछ मय जैसी ही लगती थी | |

दीवारें थामे थीं सबको, प्रेम अंश उन्माद लिए  |

एक बूँद भी बिछड न जाये, यत्न यही संवाद दिए | |

 

प्रीत पनपती देख दिलों में, रीत जगत निर्मूल खड़ा  |

मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला  | |

 

और सुनो तुमको बतलाऊँ ……

 

कुछ बातें जो छूट रहीं थीं |

उस पल का रस लूट रही थीं | |

उनके शब्द शब्द कहता हूँ  |

भावों का विनोद कहता हूँ  | |

कुछ बूँदें जो टूट रहीं थीं |

पंखों से जो छूट रहीं थीं | |

घुल समीर की मंद छुवन में, यत्र तत्र सर्वत्र चलीं थीं |

उस बयार की मादक मधु ने, जीवन का सन्दर्भ चुनी थीं | |

 

भीगा था मन, तन भीगा था |

सारा जग, जीवन भीगा था | |

यौवन की गर्माहट भीगी |

जीने की आहट भी भीगी | |

नगर द्वार नर नारी भीगे |

मन दर्पण खुद वारी भीगे | |

मस्त मधुर संसर्ग चढा था |

विधि ने क्या कल स्वर्ग गढा था ??

 

मैं यूँ ही चुपचाप खड़ा था |

गगन छोर पर चैन पड़ा था | |

घुल बूदों संग सतत बरसता |

तभी धरा कल स्वर्ग सा सच था | |

 

अवनी और अम्बर की लगी में, भरम सिसकता दूर पड़ा |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

नयनों के इस नरम कोर पर , फिर भी बूँदें क्यूँ आती थीं |

जब भीगा जीवन जग में था , क्यूँ कपोल पर ढल जाती थीं | |

घुल बारिश की बूंदों में ,सहसा कल यूँ ही खो जाती थीं |

अकुलाहट कुछ तो अजीब थी, क्यूँ यूँ ही तब रो जाती थीं | |

शायद नहीं मिला था उनको |

मीत भिगोने वाला पल में | |

अपना यूँ अस्तित्व मिटा कर |

रोती जाती थीं कल जल में | |

उन बूदों की उहापोह में, घुल जीवन का सत्व चला |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

–उपेन्द्र दुबे

२८/०१/२०१२

 

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एक सांझ ….


कल पर्वत के पार वही, एक सूरज दौड़ा जाता था |

किरणों की चटकार गगन पर, सहसा छोड़ा जाता था | |

मातम का संगीत परिंदे, चिचिया कर दोहराते थे |

फड़फड़ की बेचैनी भी, पंखों में बसते जाते थे | |

क्यूँ उधार का रंग ओढ़, कल सांझ बहुत इठलाई थी ?

वो प्रहर भी तो ना बीत सका, जब रात दौड कर आई थी | |

रंगों की वो डली यहाँ कल, ऐसे लुटती जाती थी |

धूसर मेघों की श्यामलता, रंगों में सिमटाती  थी | |

दुल्हन सा माधुर्य लुटा था |

यौवन का चातुर्य छुटा था | |

धकियाती कल रात प्रवर थी |

अंधियारी वो बात प्रखर थी | |

उहापोह के आँगन में वो, किरणें क्यूँ सिसियाती थी ?

क्यूँ भविष्य भी वर्तमान में, मिलने को बौराती थी ? ?

क्यूँ मलिन पर्वत का सर, यूँ चमक लिए इतराता था ?

क्यूँ समीर यूँ शांत भाव से, बहते भी टकराता था ? ?

वन में वृक्षों की मस्ती भी, कोलाहल बन क्यूँ बिखरी थी ?

क्यूँ बदरी की बूंदों में, हालाहल घुल कर उतरी थी ?

कलकल निर्झर का गीत भी क्यूँ, क्रंदन अरुणोदित लगता था ?

क्यूँ पाहन तट के संबल बन, मन भी अनुमोदित करता था ? ?

स्वप्न साज बन क्यूँ प्रपंच, मन में  मादकता भरती थी ?

क्यूँ अकुलाती वो प्यास वहीँ, तट पर रहकर ना बुझती थी ? ?

कल रात वहीँ निर्झर तट पर, मैंने लहरों से बातें की |

गीले उस रेत के दामन में, कुछ आढ़ी तिरछी रेखा दी | |

वो चंद लकीरें मिल कर के, एक नन्हा खाका खिंच गयीं |

थी सुबह धुप की फिक्र किसे, वो तो थी अँखियाँ भींच गयीं | |

–उपेन्द्र दुबे

१३/०१/२०१२

 

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कैसी वो थी रात…..


कहीं दूर एक पल को, धडकन थमी थी |

कहीं रात सूरज की, किरणें जगीं थी | |

कहीं दूर चिड़ियों ने, छोड़ा बसेरा |

अंधेरों की चादर में, लिपटा  सबेरा | |

 

कहीं रात मद्धम सा, झोंका हवा का |

नयन छेड़ हौले से, खोला झरोखा | |

कहीं रात आँगन में, रुनझुन नुपुर की |

वो चुपके से आँचल थी, छू गयी किसी की | |

 

किसी की नरम सी, हथेली सी थी वो |

उसी पल को आई, सहेली सी थी वो | |

गुम थी ख्यालों में, वो खुशनुमा सी |

मीठी कहानी हो, जैसे सुनाती | |

 

कहीं रात निन्दियों ने, लोरी सुनाई |

नन्हे सुबह को, थपक कर जगाई | |

अंधेरों की गुनगुन थी, चांदी सी रातें |

बनी ख्वाब मन में, संजोने को बातें | |

 

कैसी वो थी रात, दिन को जगा गयी |

किसकी वो थी बात, सपने सजा गयी | |

चलो जिंदगी को, सबेरा बना लें |

उसी रात में अपनी, दुनिया बसा लें | |

मिले जिस डगर पर, सुबह सांझ तुमसे |

चलो उस डगर पर , घरोंदा सजा ले | |

 

 

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नवल धवल मंगलमय अर्पण …..


कल मेरे आँगन में पूरा,

चाँद अचानक आया था |

तारों के उस बड़े झुण्ड पर,

थोड़ा सा इठलाया था | |

मैंने कान पकड़ ली उसकी,

सोचा तुम्हे दिखाऊँगा |

पर देखो न आधा ही है,

कैसे तुम्हे रिझाऊंगा | |

कल तक बड़ा सलोना ही था,

चांदी सी ही चमक भी थी |

राह तुम्हारे चलते चलते,

कुछ मलिन सा लगा मुझे

मैंने नदी राह में देखि,

सोचा इसे यहीं धो लूँ !

ठंडी ठंडी रात भी थी , और ठंडा नदी का पानी था |

लगा कांपने छूते ही जल

मैंने सोचा धो लूँगा

पर वो धार नदी की सहसा,
तेज हुई ही जाती थी |

भागा जाता चाँद उसी पर ,

देख हुई हैरानी थी | |

झपट पकड़ मैंने उसको फिर ,

लोटे में नदी धार भरी ,

आधी धार उड़ेली उस पर ,

रगड़ रगड़ धोया मैंने ,

कुछ खँरोच भी आई मुख पर ,

जिसका दाग अभी तक है |

 

फिर पोंछा कुर्ते से अपने |

नन्हा चाँद भी लगा था हँसने  | |

चांदी सी उस नवल भोर का ,

बना लिफाफा खुद से ही ,

भरा चाँद के टुकड़े को और,

तारों की कुछ चमक भरी |

चलने लगा डगर पर अपने

झोले को काँधे पर रख

सच कहता हूँ पूस मांह की

सर्दी बड़ी निराली है

हाड़ कंपाती पुरवाई थी

पर लगती मतवाली है

रात स्याह की डगर खतम हुई

अब पहुंचा हूँ तुम तक मैं

नन्हा रवि भी झाँक रहा था

गगन स्वर्ण की खिडकी से

खोल लिफाफा बंद भोर का

चाँद हाथ में थाम लिया

पर आँखों में आंसू आ गये

देख उसे आभा विहीन

धुले हुए इस चाँद से अच्छा

भला था मेरा वो मलीन

हो रुआंस उस बाल सूर्य से

मुट्ठी भर किरणें मांगी

उस उधार की किरण मली

मैंने उस चंद के मुखड़े को

तब देता हूँ भेंट मैं तुमको

उसी चाँद के टुकड़े को

मधुबन में कोयल थी कूकी

आधी कुक मैं भर लाया

सोचा संग चाँद के दूंगा

पता नहीं तुमको भाया

मुझे पता है नहीं भायगा ,

धूसर सा भौंडा मुखडा

पर क्या करता नवल गगन में

मुझे मिला बस ये टुकड़ा

हर आगंतुक वर्ष चमक को

गया वर्ष सब खोता है

नए चाँद की हंसी को देखो

यही चाँद तो रोता है

उसी चमक का एक अंश

तुमको ये अर्पण करता है

नवजीवन को आज तुम्हारे

खुद का तर्पण करता है

अब छोडो अट्टी कट्टी

उठो आज अब मुंह धो लो

देखो नया ब्रह्मतल सारा

स्वागत को अकुलाया है

चलो चाँद को रौशन कर दे

नया वर्ष अब आया है

 

–उपेन्द्र दुबे(३१/१२/२०११)

अंबिकापुर से ….

 

 
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Posted by on दिसम्बर 31, 2011 in कविता [Poetry]

 

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मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा …


तुम भावों का उगता सूरज,

जन मानस पर छा जाती हो |

मैं खंडित मन का कवि मेरी,

पंक्ति बन तुम आ जाती हो | |

बनी लेखनी मन स्याही संग,

अक्षर की अवली बनती तुम |

चित्त पटल पर खाका खींचूं,

रेखा भी पहली बनती तुम | |

तुम रजनीगन्धा निशि क्षण तक,

सर सुगंध नभ धरा में भरती |

जाड़े की गुनगुनी धुप का,

आसव बन अनुपूरित करती | |

तुम मधुबन की पारिजात, मैं अपना ही परिहास लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | |

 

तुम दरिया की तेज धार मैं,

उथले जल का हूँ श्रींगार |

तुम उपवन की सघन छांव मैं,

मरुप्रदेश का लुटा गांव | |

नयनों में सपनों की छवि तुम,

मैं अश्रु बन कहीं ढलकता |

तुम अधरों की प्यास सकल हो,

मैं सूखी नद बना दरकता | |

तुम पूनम की सीत चांदनी,

दावानल की एक लपट मैं |

तुब पूरब की सूर्य रश्मि हो,

अश्तांचल की एक दहक मैं | |

तुम बसंत, स्वाति सम पावन, वर्णन मैं कई बार लिखूंगा  |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | | ……

 

तुम नंदन बगिया की देवी,

मैं झुरमुट बीहड़ उपवन का |

तुम चन्दन और मैं माटी हूँ,

तुम मधुबन, मैं शूल हूँ वन का | |

जब गति शांत बने अति निश्छल,

हलचल बन तुम आ जाती हो |

जेष्ठ माह की भरी दुपहरी,

पूर्ण मेघ बन छा जाती हो | |

बरस बनी अमृत धरती पर,

जीवन के नवरंग गिराती |

एक आश की बनी मंजरी,

सर तरंग बन कर इठलाती | |

तुम भावों की भरी गगरिया, मैं उनका मनुहार लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | | ……

 

तुम मूरत मन के मंदिर की,

मैं पत्थर एक नदी तीर का |

तुमने दर्द सहा पूजी गयी,

मैं क्या जानूं हाल पीर का | |

अंक तुम्हारे बन पुनीत,

मेरे मन हवन को पूरण कर दें |

प्रेम विनीत बने हर्षित हो,

ह्रदय भाव सब अर्पण कर दें | |

शाश्वत धवल पटल सम्मुख हो,

नयनों में कोई क्षोभ न हो |

कल जीवन की सांझ ढले जब,

अन्तः पर कोई बोझ न हो | |

तुम निधि जीवन सागर की हो, मैं जीवन संघर्ष लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | |

 

–उपेन्द्र दुबे

 
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Posted by on दिसम्बर 25, 2011 in कविता [Poetry]

 

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एकाकी , तुम मेरे साथी…


एकाकी , तुम मेरे साथी,

बस यूँ ही बन कर रहना |

चलूँ छोड़ जब अपनी माटी,

हाथ पकड़ कर तुम चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

धागे जब विश्वास के टूटे,

आँगन  जब अधिकार के छूटे |

नाते जब बेमाने से हों,

अपने भी बेगाने से हों | |

मन की कोर पकड़ पगली सी,

कण कण में मेरे बसना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

अवरोहों का जाल बिछा हो,

जीवन पथ विकराल बना हो |

भाग्य सूर्य पर ग्रहण पड़े जब,

सखियाँ मेरी रूठ गयीं सब | |

पथराती  भी नेह अगर हो,

थकी देह और रुकी डगर हो |

लिए हाथ आशा का दीपक,

राह दिखाते संग चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

चलूँ छोड़ जग का कोलाहल,

पी कर जब सारा हालाहल |

मधुबन जब वीरान बना हो ,

घर में भी शमशान बसा हो | |

राहों की जब धुल छिटक, माथे की तिलक बने निखरे |

पावनता जब ह्रदय गर्भ से, होकर के नीचे बिखरे | |

मेरा ‘मैं’ मुझसे छूटे जब, कुटिल दर्भ आलापों पर |

जीवन की संगिनी रूठे जब, झूठे व्यर्थ प्रलापों पर | |

तब जीवन की परिभाषा बन, उस प्रयाण तक तुम चलना |

एकाकी तुम मेरे साथी …बस यूँ हि बन कर रहना …..

–उपेन्द्र दुबे

 
4 Comments

Posted by on दिसम्बर 24, 2011 in कविता [Poetry]

 

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