नयन उलझ नयन चले,
हया की रात ढल चले |
प्रणय की वेदना का स्वर,
जो देह में हुआ प्रखर | |
तो काल रात कुछ कही,
अनंत साथ बतकही |
दो देह भावना लिए,
कभी नहीं जो कुछ दिए | |
नजर झुकी हुई मिली,
उठी नजर से मिल खिली |
कपोल कसमसाते थे,
अधर भी कंपकंपाते थे | |
न जानती थी वो उसे,
थी दे रही थी सब जिसे | |
ये लाज आज बोलेगी,
या साज बन के खोलेगी |
न ज्ञान था प्रयाण का,
न ध्यान स्वाभिमान का | |
उतर रहे थे वस्त्र वस्त्र,
बिखर धरा पे यत्र तत्र |
दो नग्न देह मिलने को,
विकल हुए थे खिलने को | |
था डर कहीं समा रहा,
कहीं उमंग छा रहा |
कसी थी बाहुपाश में,
वो साथी था प्रयास में | |
दो हाथ रेंगने लगे,
बदन से खेलने लगे | |
खनक वो चूडियों की फिर, बिखर कहीं पे खो रही |
वो सिसकियाँ, कराह सब, मिलन के बीज बो रही | |
जो लौ बुझी थी दीप की,
बदन जला था भाव में |
जो अंग अंग से मिले,
मचलती धुप छांव में | |
वो पायलों की छन छनन, उतर जमीन पर गिरे |
थी घायलों सी वो व्यथा, जो शब्द मौन से मिले | |
रति घुली थी श्वेद में,
रिचाओं सी वो वेद में |
हवन सा साथ जल रहा,
आहूत को मचल रहा | |
अनंत व्याकरण गढे, वो साँसों की चढान पर |
बनी अतृप्त सी कथा ,वो रात की ढलान पर | |
वो कुछ पलों की बात थी,
बुझी बुझी सी आग थी |
था साथी अब भी जल रहा,
न मीत पर उबल रहा | |
निढाल एक छोर पर,
वो चादरों की ओट धर |
थका सा अधमरा हुआ,
मिलन था कुछ पड़ा हुआ | |
न धक् से द्वार काल का,
खुला कभी इति में ही |
जो धैर्य की सीमा लंघी,
रति वहाँ रही नहीं | |
अनल के द्वार पर तरल,
था सुस्त, साधना प्रबल |
वो पल की बात लुट चली,
लुटी सी वो तनिक लगी | |
वो रात थी सुहाग की,
उजडती सी वो फाग थी |
न रंग के तरंग में ,उमंग फिर से जल सका |
न यौवना के अंग में, प्रसंग फिर से सज सका | |
वो रात रोज आती है,
लुटी लुटी सी जाती है |
वो मन न शांत होता है,
वो साथी अब भी रोता है | |
जो मन के द्वार खोलेगी, व्यथा मिलन अतृप्त की |
अनेक त्रिज्य जल उठेंगे, उस अधूरे वृत्त की | |
उठेगा उसे से जो धुआं, उसे ही घेर जायेगा |
धधक वो मन की सह भी ले, कलुष मगर सताएगा | |
सवाल खोते जाते हैं,
समाज की दरार में |
ये बंधनों के वास्ते,
अधूरा साथ प्यार में | |
ये बंधनों के वास्ते, अधूरा साथ प्यार में …
–उपेन्द्र दुबे
१५/०४/२०१२

