अधूरी कविता।।।

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शब्दों ने अवकाश लिया जब,
भावों का संघर्ष चला ।
शिथिल देह और स्थिर मन था,
जीवन का संघर्ष ढला ॥
साँझ क्षितिज पर पंछी रोते,
रेतों पर बिखरी थी मीन ।
नदिया सूनी, पोखर सुने,
रातें थीं थोड़ी ग़मगीन ॥
सच कहता हूँ बहुत मगन थी,
सुने आँगन की दहलीज ।
चौखट पर खुशियां रुक गयी थीं,
देख तमाशा बड़ा अजीब ॥
और पतीले खूब खनकते,
बासी उन पकवानों से ।
जहाँ सबेरा साहस लाता,
उन बूढ़े मेहमानों से ।
बच्चे गुम थे खेल कूद में,
बात समझ में आती थी ॥
मगर जवानी पस्त पड़ी थी,
नहीं यहाँ इठलाती थी ।
मतवाला मद होश उड़ाता,
खेतों में खलिहानों में ॥
परिभाषा इंसान की बदली,
जीवन था मयखानों में ।
यह निर्ममता क्यों कायल थी,
सुने इन विरानों में ।
जहाँ पड़ी चीत्कार कराही,
दिन दुपहर शामियानों में ॥
देख तमाशा इस मंजर का,
तर्पण करने आते थे ।
कुत्ते पिंड पाक की दावत,
करते नहीं अघाते थे ॥
अब भी रूप नहीं बदला है,
साँझ क्षितिज पर होती है ।
सूरज का वो रथ नहीं ढलता,
माँ की लोरी रोती है ॥
और कौन से शब्द गढूं मैं,
जो इसको पूरी कर दे ।
इस नैराश्य साथ की बेला,
एकाकी के संग भर दे ॥
आज अधूरी बातें होंगी,
और अधूरी यह सविता ।
शब्दों के वीरानेपन पर,
जाने कब पूरी होकविता ॥

-उपेंद्र दुबे
३१/०५/२०१६

ज़िंदगी …

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ढलते सूरज की रोशनी का बोझ

डूबते उतराते उनके साथ कहीं गुम जाने की सोच

लुटती गहराइयों में घुल जाने की बेबसी

बिखरती ज़िंदगी पर पसरी एक अनजानी हँसी

शाश्वत एकांत से गलबहियां डाले नश्वर कोलाहल

सर्वत्र फैलता एक अजीब सा हालाहल

मिटते पैरों के निशान

आँसुओं में धुलते अनेक बेजुबान

कुछ कहा जाता है

बहुत कुछ अनकहा कहीं गुम जाता है

अपने शहर में अजनबी लोग

बेजान सी सख्शियत, अनजाना संयोग

दूर कहीं कुछ सिसक सी रही है

कुछ तो है जो अब तक टसकती कहीं है

ढूंढने की कोशिश युगांतर पर खड़ा करती है

ज़िन्दगी अपनी बरबादी शायद खुद ही गढ़ा करती है

तभी तो पलों का ये कारवाँ हर पल लूटा करता है

कुछ पाने का जनाज़ा काँधे चढ़ा करता है

सबकुछ पल में बुना हो, तो मन की दशा है

नहीं तो पलों की ये त्रासदी, शायद एक दुर्दशा है

इन्हे संजोने की क्रिया ज़िंदगी

खो जाने का भय बेबसी

संघर्स का साहस शायद जीवटता

और बिखर जाने की शिकन मृत्यु की कर्मठता

न जाने कब कहाँ किससे किस पल भेंट हो

जीवन का न जाने कैसा कब परिवेश हो

भाव शब्दों में बंधने को अकुलाते हैं

बंधता कहाँ कुछ, बस सब पीछे छूट जाते हैं

इस रंगमंच पर शायद सबकुछ तय है

मगर फिर भी इस व्यंजना में एक लय है

तभी तो पात्र अपनी भूमिका तन्मयता से निभाता है

नहीं तो पटाक्षेप कहाँ किसको भाता है।

 पटाक्षेप कहाँ किसको भाता है.…।

 –उपेन्द्र दुबे

(२४ / ०२ / २०१५ )

गुजारिश …

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कहीं है आग का दरिया,

कहीं शोलों कि बारिश है

समंदर कि तपिश समझों,

ये मौजों कि गुजारिश है

घने बादल बरसते हैं

कहीं पर दिल तरसते हैं

कहीं मदहोशियों कि कुछ अदायें याद आती हैं

कहीं सरगोशियाँ छुप के, वफाओं को हंसाती  हैं

कहीं पैगाम आँखों से, दिलों को चीर कर खोती

कहीं धड़कन कि दस्तक पर, जवानी रात भर रोती

छलक जब जाम है चढ़ती, सुहानी बंद गलियों में

कसम से आग लग जाती, यहाँ कमसिन कलियों में

जरा उस आग से कह दो, यहाँ मौसम कि साजिश है

समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है

यहाँ  बातों के रेलों से,

शहर वीरान सजते हैं

तबेले ज़िंदगी के जब ,

झमेलों से गुजरते हैं

शहर कि सुन्न गलियों में,

मकां  पैगाम देता है

खुली छत के झरोखों से,

ये मंजर आम होता है

शिफा-ए -मौत से कुछ ज़िंदगी करती सिफारिश है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है

अभी वीरानियों पे कुछ,

दीवारें दर्प करती थीं

कफ़न ढांचों पे लिपटा कर,

बदन को गर्म करती थीं

सिहर कर चांदनी, मजमूनियत पर मुस्कराती थी

शहर शमशान में सोते हुए एक गीत गाती  थी

रवानी ज़िंदगी की, हर कदम गुलशन सजाती है

मुहब्बत झील सी, बस हर तरफ किस्सा सुनाती है

उसी गुलशन कि अर्ज़ी से, फलक लिखता तवारीख है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौसम कि गुजारिश है

 

धधकता कुछ दबा सा आज, सीने में दहकता है

ढली हुई साँझ के उस छोर पर, सूरज चमकता है

सितारे टूट कर आँगन में, अब भी रोज गिरते हैं

कसक छोटे से दामन कि, फलक तक साथ फिरते हैं

मगर रुशवाईयां ही हर कदम, गुलजार होती है

उजड़ कर आज ये बस्ती, शरम से तार होती है

उसी बस्ती कि सरहद पर, सबेरा छुप के रोता है

अँधेरा आज गलियों में दुबक कर खूब सोता है

सुबकती हर तरफ बस आज अरमानों कि डोली है

कहीं माथे चढ़ी है राख, बस करती ठिठोली है

सजी इस आरती में बदनसीबी, एक अदा सी है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है

 

–उपेन्द्र दुबे(०१/०२/२०१४)

सियासत …एक नजरिया …

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मंदिर की ख़ामोशी देखि
मस्जिद भी खामोश थी
नफरत का बाजार सजा था
और सियासत चोर थी

 

सड़कों पर दरकार खड़ी थी
महलों में सरकार
गलियों में लाशों की बस्ती
चौराहों पर आस
अभिलाषा बस सिसक रही थी
कहीं रात बस शोर थी
नफरत का बाजार सजा था ,और सियासत चोर थी

 

ख़ुशी बंद पन्नों पर अटकी
नजर पड़ी तो झूमा झटकी

आटा दाल नमक और शक्कर

जीवन का हर खेल था चक्कर

असलाहों की धमक सुबह ले

महज रात भर रोता था

मुरदों  की ढेरी पर सूरज

चमक फलक में खोता था

मटमैली जीने की चाहत

जीवन पर कमजोर थी
नफरत का बाजार सजा था, और सियासत चोर थी

 

सत्याग्रह खंजर करते थे

गूंगे थे चीत्कारते

पूर्वाग्रह से सत्ता दुसित

बहरी हुई पुकार से

क्रंदन की बोली लगती थी

अभिनन्दन की बेला  में

नीम चढ़ी शक्कर के ऊपर

गुड जा बसी करेला में

कडवी साँसों की गर्माहट फ़ैल रही पुरजोर थी

नफरत का बाजार सजा था, और सियासत चोर थी

 

पूरब में बंटवारे गूंजे

मध्य में थी क्रांति

उत्तर में ध्वज जलते देखा

दक्षिण में थी भ्रान्ति

महलों में बलिदान समर था,

डाकू चढ़ते पालकी

और सिपाही चाकर बनता,

समरभूमि किस काम की

रोज रात बरबादी का, बस मंजर सजते देखा था

बलात्कार का कोलाहल, बस हँसते हँसते देखा था

राजा था रनिवास में डूबा

प्रजा त्रस्त चहुँ ओर थी

नफरत का बाजार सजा था, और सियासत चोर थी

 

मेरी यात्रा का अनुभव, बदरंग हूर के जैसा है

स्वप्नहीनता  से श्रापित, उस नयन नूर के जैसा है

खारे जल के मध्य बैठ मैं प्यास सुनाने आया था

मीठे पानी की गगरी में आस जगाने आया था

पर गगरी में नमक घुली थी,

नमकीन यहाँ जग सारा था

प्यास प्यास चिल्लाते साथी

सबका जीवन हारा था

उस प्यासी प्यासी बस्ती से ,

घूम घूम कर लौटा हूँ

जहाँ कुंड बहुतायत में थे

लोग घिरे एक आयत में थे

आयात के उस पार कुंड  में,  जहर घुली बस मिलती थी

और मिलाने वाली टोली , बहुत जोर से खिलती थी

आयात से आयत भिड़ते थे

सुबह शाम उन गलियों में

और तमाशा देख रहे वो

बस सत्ता की गलियों में

किसको फिकर कहाँ किसकी थी

रात बहुत पुरजोर थी

नफरत का बाजार सजा था, और सियासत चोर थी

–उपेन्द्र दुबे(10/०७/२०१३)

हरिया काका…

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पुराने शहर की, बड़ी याद आती है
अरसा गुजरा, कुछ यादें अब भी रुलाती हैं
कुछ बातें अब भी डोलती हैं
कुछ यादें बोलती हैं
याद आता है वहीँ का, एक वाकया

जिसमे सबकुछ लगभग, हरेक जीवन में घटा

 

मेरे मोहल्ले में ही, हरिया काका का परिवार रहता था
सांझ चूल्हे में आग नहीं तो, कभी मटके से पानी बहता था
चार बेटे, बूढ़े माँ बाप, काका और काकी
सब हिल मिल रहते बने एक दूजे के साथी
गरीबी थी, पर संतोष भी था
जीवन से लड़ने का माद्दा, और जीने का जोश भी था
धीरे धीरे बच्चे बढे
शादियाँ हुई, झगड़े बढ़े
मकान कमरों में बंट गया
आँगन दीवारों से अंट गया
अब चार दरवाजे अलग अलग निकसारी
काका काकी रहने लगे चार कमरों में बारी बारी
आँगन के एक कोने से किसी बच्चे की गेंद, दुसरे कोने में नहीं जाती थी
और अगर चली गयी तो कोने वाली चिल्लाती थी
पर चार कोने के बच्चे कहाँ रुकते थे
लुक छिप के एक दूजे से मिलते थे
पर धीरे धीरे उन कोने वालियों ने बच्चों में भी, द्वेष का जहर भरा
अब तो बच्चों में भी तकरार बढा
न जाने आगे क्या हुआ, मैं दूर हूँ
पर एक तुलनात्मक विश्लेषण करने को आज मजबूर हूँ
एक घर, फिर चार कमरों में चार घर
घर धीरे धीरे होता बेघर
ठीक वैसे ही जैसे, महाराष्ट्र में बिहारी का होना खटकता है
अब धीरे धीरे बिहार और आसाम भी भटका है
अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही हालचाल है
अपने देश का तो हरिया काका से भी बुरा हाल है
यहाँ भी हर कोने में कुछ कोनेवाले सिपहशलार है
जनता भी आँगन के बच्चों की तरह अनजानी बेपरवाह है
आजीविका की गेंद यहाँ भी एक कोने से दूसरे कोने में लोगों को ले आती है
कुछ बदले हुए ढंग से वो कोनेवालियाँ यहाँ भी चिल्लाती हैं
ये चिल्लाना अब तो दंगों का रूप भी लेता है
कई जानें जाती हैं पर मरने वाला, कोनेवालों का थोड़ी कोई बेटा  है
उनको तो बस कोनों की फिक्र है
अख़बारों की शुर्खियों में थोड़ी बहुत जिक्र है
आये दिन ये घटनाएं और हुडदंग होते हैं

परन्तु यहाँ के काका और काकी तो लगभग हमेशा सोते हैं
शायद यही यहाँ के काका काकी के नेतृत्व का आधार है
और बच्चो का भी मूल मुद्दों से कहाँ कोई सरोकार है
रोज नए कोनेवाले पैदा होते हैं
नए नए कोने खोजते हैं
कभी राज्य और क्षेत्र के नाम पर
तो कभी हिन्दू मुस्लिम के नाम पर
भाषा और संस्कृति भी बांटी जाती है
पर बच्चा बनी यह जनता नहीं समझ पाती है
दंगों में मारे गए लोगों का, धर्मों के आधार पर आदर सम्मान होता है
पीड़ा तो दूर कारण भी अनजान होता है
यहाँ के हरिया काका कभी कभी इतना पगलाते हैं
की दंगाइयों को ही शहीद बताते हैं
रख दिए जाते हैं सारे कारण ताक  पर
क्यूंकि अपनी कुर्सी भारी नजर आती है हर बात पर
काश की हरिया काका की तरह यहाँ के मुखिया भी समझ पाते
की शराबी कल्लू की नजर रहती है घर की शांति पर आते जाते
उसकी वो नजर व्यभिचार का दर्पण है
जिस पर सबकुछ आज इनका अर्पण है
आज कल्लू और उसके साथियों के महिमामंडन में घर के कुलवधू शांति का सौदा करने लगे हैं
हरिया काका ८६ की उम्र में भी बहकने लगे हैं
चश्मे के उस पार से उनको ये नजर नहीं आता है
कि  यही कल्लू ,काकी को भी भौजाई बुलाता है
स्वार्थ के अंधे आज अपने ही घर के लोगों को कटघरे में खड़ा करने को अमादा है
क्यूंकि कल्लू के गुर्गों को खुश करना उनको जरूरी ज्यादा है
कल्लू की लाठी और अपने स्वार्थ का दंभ काका की कुर्शी की पहरेदारी है
शायद लोग बच्चे हैं उनकी समझदारी से कहाँ यारी है
पर अगर ये बच्चे बड़े हुए
कल को खड़े हुए
तो काका की पतलून तक न बचेगी
दाढ़ी चस्मा दूर पड़ा होगा
पगड़ी गर्दन पर अड़ेगी
मन को मोहते मनमोहन का रूप हमेशा पूजनीय नहीं होता
वक़्त किसी का हमेशा दयनीय नहीं होता
ठण्ड कितनी भी हो घर जला कर कोई हाथ नहीं सेकता
दीवारों को तोड़ कोई घर की इज्ज़त भेदियों के बीच नहीं फेंकता
आज वो शहर छूटा, छूट गया हरिया काका का वो परिवार

पर देखता हूँ की हर शहर में वो एक शहर है, और घर में कुछ ऐसा ही मच है हाहाकार

ध्रितराष्ट्र के पुत्रमोह ने एक महाभारत को जन्म दिया था

उसके अन्धत्व ने सारी इंसानियत को झकझोर दिया था

यही वो भारत है, और काल भी शायद सबकुछ दोहराता है

कुछ कुछ आज भी वैसा ही नजर आता है

आतंकवादी शहीद करार दिया जाता है

देश तुला पर एक अंधे स्वार्थ को तोल  रही है

हर तरफ शायद निराशा बोल रही है

पर जो भी हो वो शहर मुझे अब भी याद आता है

जैसा भी हो उस शहर से एक नाता है

 

–उपेन्द्र दुबे(०६/०७/२०१३)

लाल सलाम — अजीब सी क्रांति

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साल के ऊँचे ऊँचे पेड़, उनमे लिपटी जंगली लताएं
महुआ की मादक शुगंध, मतवाली जंगली अदायें
तेंदू के पत्ते,
खुखरी के छत्ते
सरसर की आवाज
जीवन का आगाज
चिचियाते परिंदे
हरे हरे फंदे
धंसती हुई कोलतार की काली चिकनी सड़क
जंगली जानवरों की मदमस्त धडक
धड़ल्ले से गुजरती, एकाध मोटर बस
गूंजता जंगल अजनबी निगाहें बरबस
नंगा बदन,
नीला गगन
बरछी गुलेल, तीर कमान
छटकते  हुए लोग अनजान
सरहुल के रंग
करमा  के संग
पहाड़ी ढलानों में झोपड़ियों के झुरमुट
कहीं हँसते लोग, कहीं थोड़े गुमशुम
नाच गाना
जीवन का अपनी मर्जी से आना जाना
दूर की एक बस्ती में लगता साप्ताहिक बाजार
बड़ी बेसब्री से रहता था इंतज़ार
कहीं मंगल,कहीं बुध तो कहीं गुरु
यकीन मानिए जीवन के बहुत से रिश्ते होते थे इन्हीं बाजारों में शुरू
रुपयों का सरोकार बहुत कम था
नमक , आटा  दाल में ही जीवन गुम था
बहुत दिनों पहले की बात नहीं है ये साहब
पर लगता है जैसे बरसों पहले बन गया सबकुछ अजायब
एक अजीब सी क्रांति ने यहाँ भी अपने पाँव पसारे
लोग वहीँ से बन गए बेचारे
न अब वो जल जंगल जमीन अब अपना रह गया
क्रांति के इस रंग में शायद सबकुछ ढह  गया
सड़कों की चिकनाहट में गड्ढों ने दखल  दे दी
मदमस्त जीवनधारा एक घुटते तालाब का शकल ले ली
तीर की सर्र खो गयी कहीं पे
गरजते हैं बंदूकों की धमक यहीं पे
न अब वो बाजार है न वहां जाने की ललक
बची है तो बस अपने ही आँगन में गुम जाने की कसक
घरों से बच्चे उठाये जाते है क्रांति के नाम पर
गाँव के गाँव जलाये जाते हैं शांति के नाम पर
आये दिन मौत का खेल अलसुबह शुरू होता है
पर यकीन मानिये कोई नहीं रोता है
साल के वो ऊँचे दरख्त शायद गवाह हैं
पर उनको काटते  लोग बेपरवाह हैं
ढलानों से मैदानों तक का सफ़र पाबंद है
दिल दरिया, दिलवाले मूसलचंद हैं
खाकी की आये दिन रंगाई होती है
लाल रंग की ये क्रांति दिनोदिन अंगडाई लेती है
टोलों में बटे मुखिया, आरोप प्रत्यारोपों का दौर
मरते सिपाही, ढोल बजाता चोर
न जाने इस रात की कब होगी भोर
या ऐसे ही गुजरती रहेगी प्रहर पे प्रहर चहुँ ओर
जंगल का चीखना
मना है छिकना
जानवरों का क्रंदन
चिताओं पर सजते चन्दन
बेगुनाहों का खून
क्रांति रही भून
लोगों की हताशा
रोती  हुई अभिलाषा
असलाहों  का बाजार
जाने कहाँ है सरकार
चलती बसों पर गोलियों के निशान
पेड़ों पर लटके लाल सलाम
ऐसी क्रांति की आवाजें सत्ता के गलियारों में कहाँ पहुंचती है
शायद साड़ी कार्रवाइयां कागजों पर होती हैं
तभी तो होली का रंग यहाँ केवल लाल है
मौत जिन्दगी को फंसाए एक मकड़ी का जाल है
न जाने वो दिन फिर कब लौटेंगे
पलाश के छांव तले  बेख़ौफ़ राहगीर बैठेंगे
या यूँ ही फलसफा कागजों पर कविता का रूप ले सोता रहेगा
और नक्सलवाद हर घडी नए नए जीवन का रूप ले धोता रहेगा

–उपेन्द्र दुबे (० ३ /० ७ /२ ० १ ३)

संवेदनहीन पटकथा …

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लुटी सी आबरू का तकाजा
जिन्दा अरमानों का जनाजा
मुस्कराता निष्ठुर राजा
भांडों का बैंड बाजा
कुछ काल की लचक थी
सांसें अटकी सी वो हलक थी
आंसुओं का मोल था
जीवन शायद झोल था
तभी तो बादलों का फटना, आंसुओं की बाढ़ ले आया था
कल तक जहाँ घण्टे बजते थे, आज मुर्दों का साया था

बेचारगी कुछ कुछ ठुमकती थी
बेहया बड़ी बेरहमी से हंसती थी
खींसे निपोरते चंद लोग
बाकी पिलते हुए संजोग
घढ़ियाली आंसुओं का रिवाज था
बेजान बदन से उतारा जाता लिबास था
नाटक और सच का रंगमंच है
शायद दुनिया ही प्रपंच है
तभी तो लाशों के टुकड़े काटे जाते थे
और एहसानों की दरियादिली ऐसी की अख़बारों में इश्तहार छप के आते थे

कसाई भी शुतक का शोक मनाता है
हंसी ख़ुशी और आडम्बर से लोक लजाता है
डायन भी सात घर छोडती है
अपने घर के सदस्यों को जोडती है
लोमड़ी, शियार, कुत्ते इन सब की भी एक मर्यादा है
कर कुटुंब की मौत पर बहते इनके भी आंसू ज्यादा है
परन्तु इन सब से ऊपर मैं इंसान हूँ
ऐसी दकियानुशी बातों से परेशान हूँ
तभी तो बर्बादी का बाज़ार सजाता हूँ
और उसकी एक दूकान पर मंगल गीत गाता  हूँ

चिता की आंच पर रोटी सेकने का ये चलन
मुर्दों की ठण्ड से बुझते हवस की जलन
कुछ की दबी हुई हंसी
कुछ की जान है फंसी
कुछ जीवन दान में समर्पित है
कुछ उन पर अपनी दूकान में अर्पित हैं
अजब सा चलचित्र है
जिसमे सबकुछ विचित्र है
शोक शंतप्त मैं भी हूँ कैसे कहूं
क्यूंकि दिनचर्या वही है, वहीँ मैं भी हूँ
पर शायद देख रहा हूँ इस चलचित्र को पिछले कुछ दिनों से
तभी तो भावशून्य सा लगता है सबकुछ बिना इन नगिनों के
तीन तरह के नायकजिनकी नियति ने इस चलचित्र को अमर किया
मृत, जीवित, और जिजीविषा के यज्ञ में जिसने आहुति दिया
जाने कब तलक याद आयेंगे
या ये भी और चीज़ों की तरह यूँ ही भुला दिए जायेंगे

उपेन्द्र दुबे(२७/०६/२०१३ )

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