अन्ना जी की कर्तव्यनिष्ठां या बाबा रामदेव की देशभक्ति पर मुझे लेस मात्र संदेह नहीं परन्तु कुछ बातें हैं जिनका इतिहास की समयावली में गौर करना निहायत ही आवश्यक है …
१.) नेतृत्व चाहे अन्ना का हो या रामदेव का हमें नहीं भूलना चाहिए की भीड़ जनता की ही है जो कहीं न कहीं किसी न किसी रूप में सरकारी अमलों द्वारा निश्चित रूप से प्रताड़ित होती रही है |
२.) भावनाओ का खेल चाहे जो भी खेल रहा हो किन्तु हैं ये जनभावनाएं ही , और इतिहास साक्षी है की जनभावनाओं की इसी वेदी ने इंदिरा गाँधी जैसी कद्दावर राजनीतिज्ञ की आहूति ले ली थी एवं जयप्रकाश नारायण को अमर बना दिया | ये बात और थी की परिवर्तन की उस गंगा का भार ज्यादा देर तक मोरारजी देसाई नहीं उठा सके और पुनः कांग्रेसी सुरसा ने देश को अपना ग्राश बना लिया…किन्तु अहम् बात थी जनता की ताकत का एहसास और वो जे पी आन्दोलन ने करा दिया था.

३.) और जब आज ये परिवर्तन की बयार पुनः बही है तो फिर वो समय आ गया है की, सत्ताधिसों और जनता के दलालों को ये एहसास करना जरूरी है की ये रामदेव या अन्ना नहीं
जन की ताकत है और ये भावना नहीं जनाक्रोश है जिसमे हर जन महेश बनने का दम रखता है …

सत्ताधीशों के सिंहासन पर अभिराम जरूरी है
गण का अब यह जन के हाथो, पूर्ण विराम जरूरी है
आक्रोश जब अनल बने , महलों का ध्वस्त जरूरी है
नयी भोर के स्वागत को, इस रवि का अस्त जरूरी है

जय जन….. जय जनार्दन

(उपेन्द्र दुबे )

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