सबेरे सबेरे ,

ख्यालों के आँगन में चुपके से मेरे  |

ओढ़े वो रेशम सी किरणों की चुनर,

ले कंगन की खनखन लरजते से घुमर | |

सुकोमल से पग में छनकते थे पैंजन,

लगे बोल उसके हों भँवरों के गुंजन | |

नजर फेर उसने पलट कर जो देखा ,

लगी जैसे बदली हो किस्मत की रेखा | |

आई वो ऐसे परी उस जहाँ की,

अब से वो पहले न जाने कहाँ थी | |

उनींदी सी आँखों ने देखी जो काया,

लगी जैसे जल में उतरती सी छाया | |

न जाने ये सपनों की दुनिया हंसी थी,

या किस्मत लिए उस जहाँ में खड़ी थी | |

धड़क जाये दिल तो ये दुनिया हंसी है,

नहीं तो ये मानो कमी ही कमी है | |

कभी सोचता हूँ वो पल फिर से लौटे ,

चले ले के संग मुझको अपने समेटे | |

वो चाहत के बादल बरस जायें फिर से,

भिगो दे वो आँचल जो है इस जमीं पे | |

सिमट जाऊं उनमे भुला के जहाँ को,

ये दुनिया मेरी भी बसी तुम जहाँ हो | |

(उपेन्द्र दुबे)

 

 

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