क्यूँ घायल हो जाता है मन, इस परिदृश्य को देख कर |

हर जनसमूह जब दिखता है, बारूद के एक ढेर पर | |

टूटे सपने उजड़ी माँगें, अपलक निहारती हुई आँखें |

ऐसे दारुण दुःख दर्द में , आशा भी छोड़ चली सांसें | |

कल की ही तो ये बात है जब , बाजु में बच्चा रोया था |

चुम्बन गालों की दे कर के , माँ के आँचल में सोया था | |

कल तक पांखों से चिड़ियों के , आँगन भर जाया करते थे |

सुबह सांझ इन बागों में , झुरमुट भी गाया  करते थे | |

हर रोज दिवाली होती थी, और प्रेम रंग की होली भी |

सजदे में झुकता हिंदू सर , मुस्लिम माथे पर रोली भी | |

हिंदू मुस्लिम के सौरभ से , करुणा की सुरभि उठती थी |

बंधुत्व की बूंदों से बरबस, हर द्वेष की बदली फटती थी | |

बूढ़े पीपल के करतल भी, संगीत निकाला करते थे |

ढोलों की थापों पर जब मिल , सब मेघ बुलाया करते थे | |

धरती की उपज थी अन्न धन |

खुशहाली नाचती छमाछम | |

क्या हुआ उन्हीं खेतों को अब |

खो गया यूँ ही पल भर में सब | |

क्यूँ घंटे की आवाज भी अब |

बारूदों की बौछार लगे | |

क्यूँ  मस्जिद की अजान हमें |

खाली सरकस बेजान लगे | |

क्यूँ लहू रंगे अब हर मंजर |

क्यूँ विकल  हुआ इतना खंजर | |

क्यूँ लाशों की तन्हाई हमें , इतनी मनभावन लगती है |

क्यूँ श्मशान हर गली में अब, मंदिर सी पावन  लगती है |  |

(उपेन्द्र दुबे)