ख्यालों की बस्ती में खोया हुआ मैं ,

कभी पूछूँ दिल से कभी सोचता हूँ  |

वो लम्हों की बातें जो लम्हों में गुजरी ,

उन लम्हों की साजिश कहाँ रोकता हूँ   | |

 

कभी पूछूँ दिल से कभी सोचता हूँ  …….

 

वो चांदी सी रातें समंदर के  तट पर ,

मोहब्बत की बातें कभी पनघट पर  |

वो ख्वाबों का दिल की फलक पर मचलना ,

फिर चुपके से आकर इन आँखों में ढलना  | |

वो ख्वाहिश के बदल उमडते घुमडते ,

बरशने को पागल इस दिल की दरक पे   |

दरक जो कसक बन चुभी मेरे दिल में ,

उस दिल की चुभन को कहाँ कोसता हूँ   | |

 

कभी पूछूँ दिल से कभी सोचता हूँ  ………

 

क्या नम थी वो आँखें ?

या शबनम की मोती ?

वो आँशु थे मेरे या बारिश का पानी ?

परिंदों की फड़फड़ या दिल का बिखरना ?

या गम का मेरी चंद खुशियों में पलना ?

 

सपन साज़ ले कर चला था वहां से ,

ये सोचा था नगमे फशाने बनेंगे  |

भटकता हूँ अब भी उन्ही रहगुज़र में ,

ले टुटा हुआ साज़ अपने ही दिल का   |  |

फखत वक़्त की ले कहाँ आ गयी है ,

उन क़दमों की आहट सदा ढूँढता हूँ  | |

 

कभी पूछूँ दिल से कभी सोचता हूँ  ………

 

(उपेन्द्र दुबे )

 

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