सोचता हूँ , तुम्हारा दोष ही क्या था जो मैं तुम्हें कुछ कह सकू, क्यूंकि चाहत ही मेरी कुछ ऐसी थी जो मिल न सकी  |

चला जा रहा था मन में एक चाह लिए कि कोई हो जिसे मैं , मैं कह सकूं , जो मुझे समझ सके , जिसे मैं खुद को समझा सकूं और मैं खुद जिसे समझ सकूं |

जिसके साथ मैं जिंदगी के हर पल बाँट सकूं , और जिसका हर पल सहेज सकूं, अपना सकूं …

जो मुझसे मुझे अपना सके और कह सके कि वो मेरा है ..

मेरी जिंदगी का हर पड़ाव उसका हो , जिसके छांव तले मैं सुस्ता सकूं | थका नहीं हूँ मैं , मगर एक चाह है कि , उसकी हथेंलियाँ सहला सकें मेरे माथे को , पहुंचा सकें मुझे उसी शिखर तक जहाँ से मैं गिरा था | धकेल कर नहीं , बल्कि मेरी सोयी हुई उमंगों को छेड़ कर …..

जब मैं शिथिल हो जाऊं, तो वो बतला सकें कि गतिशीलता ही मेरा लक्ष्य है और चलते रहना ही जीवन ..

मेरे पैरों कि थाप से जिसके पायलों कि छनक फूटे ,

और मेरे हाथों कि थरथराहट से , जिसके कंगन कि खनक |

जिसके माथे का बल मेरे विचारों कि सघनता हो , और मेरा ओज जिसकी बिंदिया कि झिलमिलाहट |

जिसकी अल्हड़ता मेरी चंचलता हो, और जिसके आँखों कि चमक मेरी उर्जा |

मेरा कोरा  जीवन जिसका दामन हो , और मेरा उद्देश्य जिसकी पूजा |

शांत इतनी कि ध्यान भी बोलने को मचल उठे |

गन्ने कि गरेणी से मीठे जिसके बोल हों , और देह  कि गर्माहट ऐसी , जैसे शर्दी कि गुनगुनी धुप |

जिसका जीवन ऐसा जैसे लयबद्ध संगीत |

धरती कि तरह जिसमे शोखने कि ताकत हो, और सूरज कि तरह सुखाने का जूनून |

व्यक्तित्व ऐसा जैसे आकाश कि अनंतता ,

गंभीरता ऐसी , जैसे मंथर गति से बहती पावन  गंगा |

चंचलता ऐसी , जैसे इठलाती , बलखाती पहाड़ी नदी ,

और समर्पण ऐसा जैसे भक्ति |

ह्रदय कि विशालता ऐसी जैसे मातृत्व , निश्छलता ऐसी जैसे बचपन |

आँखों में जिसके सागर कि गहराई हो, और शरमाये ऐसे जैसे छुईमुई |
बदन कि सुघड़ता ऐसी जैसे संगमरमर कि तराशी गयी मूरत |

सांझ कि ललछौंही किरणों सी जिसकी सिन्दूरी आभा हो , और सौंदर्य इतना पवित्र जैसे खुदा के दर पर दुआ मांगती कोई हूर …..

उसके कंगन ऐसे जैसे शुक्ल पक्ष का चाँद , आँचल ऐसा जैसे सितारों कि झिलमिलाहट |

उसके देह कि सुगंध ऐसी , जैसे भोर में उपवन से आती मंद पवन |

उसके नज़रों कि रौशनी ऐसी, जैसे पूर्णिमा कि चांदनी से धुलती रात |

मैं जनता हूँ कि वो नहीं है, कहीं नहीं है …

मेरी ये कपोलगार्भित चाह , कल्पना के तानेबाने पर चढ़े चाहत के धागों पर ही सिमट कर रह जाएँगी , लेकिन फिर भी भावों के डगर पर चलता हुआ , कभी कभी बहुत दूर निकल जाता हूँ |

बहुत दूर……

शायद इतना दूर कि वास्तविकता का भान ही नहीं रह जाता है मुझे |

और तब फिर कभी कभी मेरे दिल में ख्याल आता है कि जिंदगी का कोई पड़ाव तो ऐसा होगा , जिसके नरम छांव तले उगते सूरज कि प्रथम रश्मियों कि गुदगुदाहट , अहसास कराएंगी उसके होने का , जिसकी कमी अंधेरो कि तरफ आकर्षित करती है ,और जिसके बिना जीवन का सूनापन खंडहर के सन्नाटों सा लगने लगता है |

मगर ये हो न सकेगा , शायद कभी न हो सकेगा  …..

मगर क्या करूँ उन सपनों का ?

जिनमे उठते ख्यालों के भवँर कभी कभी इतने उलझ जाते हैं ,ह्रदय में उठते भावों का वेग इतना तीव्र हो जाता है कि लगता है कि , तुम्हारे हाथों कि तर्जनी थामे , क्षितिज  के उस पार ढलते सूरज के साथ सुदूर अनंतता में कहीं खो जाऊं |

जहाँ कोई न हो , कोई भी नहीं ….

केवल व् केवल तुम्हारा साथ हो , तुम्हारे आँचल कि नरम रेशमी छाँव हो | तुम्हारा आगोश हो , वो भी इतना बड़ा कि जिसमे मेरा पूरा अस्तित्व समा जाये |

और इतना समा जाये कि जहाँ न कोई भाव , न कोई सोच और न ही कोई व्यथा छु सके मुझे |

तुम्हारी खिलखिलाहट ऐसी हो , जो उपवन में लगे पौधों कि सुकोमल डालियों पर निकलते कलियों के बचपन में , इतना उमंग भर दें , इतना वेग भर दें कि वो कब अपने यौवन में प्रवेश कर प्रसून बन जायें , उन्हें खुद भी पता न चले |

तुम्हारी वासना में भी प्यार हो,

तुम्हारे रोने में भी गीत हो |

तुम्हारे गम में भी खुशी हो |

तुम्हारी इच्छा में भी संतुष्टि हो |

तुम्हारी कल्पना में भी सृजन हो |

तुम्हारा साथ जीने कि ललक पैदा कर दे |

एक उद्देश्य दे |

प्रेरणा दे |

जीवन को एक दिशा दे |

शक्ति दे , स्फूर्ति दे , उदगार दे और इन सबके साथ साथ केवल व् केवल प्यार दे |

इतना प्यार कि फिर कोई चाहत ही न बचे |

तुम रंग हो,  जिसमे रंगना चाहता हूँ मैं |

तुम संवृद्धि हो, जिसका वरण चाहता हूँ मैं |

तुम शिखर हो जिसका आरोहण  चाहता हूँ मैं |

तुम कल्पना हो जिसका सृजन चाहता हूँ मैं |

तुम सुधा हो जिसका पान चाहता हूँ मैं |

तुम सागर हो, जिसमे डूबना चाहता हूँ मैं |

तुम सलिल हो, जिसमे बहना  चाहता हूँ मैं |

तुम नीड़ हो, जिसमे बसना चाहता हूँ मैं |

तुम जीवन हो,संगीत हो, तुम गीत हो , तुम प्रीत हो , तूम रीत हो, तुम मीत हो , तुम उमंग हो, तरंग हो, लय  हो, सुर हो , तान हो, तर्पण हो, समर्पण हो….

तुम ये हो..तुम वो हो ….

तुम ऐसी हो …तुम वैसी हो …

तुम कैसी हो ?

कैसी हो तुम ?

तुम हो भी कि नहीं ?

तुम हो तो कहाँ हो ? ..कहाँ हो तुम ?

बोलो कहाँ हों ????

मेरे ह्रदय में उठते ये भाव यदि प्रेम है ,

तो हाँ मुझे प्रीत  है |

मगर किससे  ????

कौन है जो मेरी चाहत को रंग दे ?

कौन है जो मेरे जीवन को संग दे ?

मेरी बंसी को तान  दे ?

मेरी देह  को जान दे ?

गीत को गान दे ?

चाहत को मान दे ?

लेकिन वो तो नहीं है …..कहीं नहीं है …

ये तो अधूरी कसक है ,

कोरी कल्पना है |

तन्हाई है |

एक अधूरा प्रश्न है , जिसकी अधूरी पहचान है |

एक टुटा स्वप्न है , जिसकी कड़ियाँ बिखर  गयीं हैं |

उन्मुक्त आकाश में उड़ते परिंदों कि पांखें थीं, जो टूट कर झर  गईं हैं |

पक्षियों के कलरव के मध्य गूंजता बूढ़े पीपल कि युवा पत्तियों का करतल था , जो अब बंद हो चूका है |

आसमान को छूते पहाड़ों के मध्य यह उस ध्वनि कि अनुगूँज थी, जो कब कि खत्म हो चुकी है |

क्यूँ सोचता हूँ मैं ये शांत अपने आप में खोकर, जबकि मैं जानता हूँ कि तुम नहीं हो |

कहीं नहीं हो……

लेकिन फिर भी लगता है कि तुम हो ….यहीं कहीं हो , जिसकी आहट अभी ही छु जायेगी मुझे ….

अभी ही …बस अभी ही…..

–उपेन्द्र दुबे

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