तकती आँखों की कोरों में,

अविरल बहते उन लोरों में |

निश्चय ही है कोई टीस घुली  | |

कहने को आतुर व्यथा कथा,

अन्तः की पूरी मनोदशा  |

कब किस से कहाँ कैसे वो चली ?

ढूंढन को देखो कौन गली ?

वो चली चली फिर गली गली …. वो चली चली फिर गली गली ….

अंतर में मानो रहने को,

निर्झर बन दिल में बहने को  |

शीतल सी बयार की नर्म छुअन ,

आँचल सी किरण की रेशमी बन  | |

छन – छन करते पैंजन बरबस ,

दहलीज़ वो प्रीत की लाँघ के जब  |

रक्खी दो सुकोमल पग डगमग  | |

खुशियों का कलश फूटा ही था ,

की लुट गया हाय पल भर में सब !!!!

सपनों में किसी के वो थी पली |

खिलने से पहले झर जो चली ,

फिर खिल न सकी अधखिली कली | |

वो चली चली फिर गली गली…. वो चली चली फिर गली गली ….

ऐ काल भला क्या देखा तू,

चेहरे  की चंद लकीरों में ?

उस भाल पे रचना कैसी रची ,

उलझी फूटी तकदीरों में ?

कह आज सुना, सबको तू भला ,

वो सच है या है निरा सपना ?

जो घाव था अब नासूर बना ,

ये टीस उसी की बाकी है  |

क्यूंकि ये धरा तो थाती है  |  |

लूटा था जिनके सपनों ने,

बाँटा था जिनको अपनों ने  |

ये दर्द उसी से रिसता है ,

जिनकी है कसक इन आँखों में  |

रूकती थमती इन साँसों में  | |

अब कहन कहाँ मैं जाऊंगी ?

कब किस से नैन लड़ाउंगी ?

वो खड़ी तकत अब बंद गली  |

नमकीन भई मिसरी की डली | |

वो चली चली फिर गली गली ….वो चली चली फिर गली गली ……

–उपेन्द्र दुबे

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