सत्ताधीशों के सिंहासन पर, अभिराम जरूरी है |
गण  का अब यह जन के हाथों,  पूर्ण विराम जरूरी है  | |

जब मांग रक्त से शोभित हो,

जब स्वप्न नयन पर क्रोधित हो |

तरसे रसोई जब जल अन्न को ,

महंगाई करे आलिंगन हो | |

कुरुक्षेत्र बने जब नगर द्वार ,

दुर्योधन ही करता हो वार  |

हर द्वार सांझ जब भूख जले,

हो काल विकल मिलने को गले | |

तब भ्रष्टों के उन्मूलन को , एक जन संग्राम जरूरी है |
मृदु वचनों का कोई मोल नहीं, अब तो  परिणाम जरूरी है | |

जब जनप्रदेश की गलियों में,

बस मातम का व्यापार चले |

जब मंडप पर शहनाई नहीं,

बंदूकों की दरकार लगे | |

जब हल्दी का हो वर्ण लाल,

नरमुंडों की बनती हो माल |

तब मंदिर मस्जिद टूटेंगे,

और जनाक्रोश ही फूटेंगे  | |

आक्रोश  जब अनल बने , महलों का  ध्वस्त जरूरी है |
नयी भोर के स्वागत को,  इस रवि का अस्त जरूरी है | |

जब जन शिशु सी प्यारी न लगे,

परिहार्य विपद भारी न लगे |

एक शाह के सपनों की खातिर,

जब धरा ताज को ढोती है | |

तब चूल्हे ही पैबंद लगें

और कफ़न त्याग को रोती है |

जब स्वेद, लहू समरंगी  हों,

मखमल कपास पर नंगी हो | |

तब नाश निरंकुश का करने, विप्लव का गान जरूरी है |

कुत्सित वसंत पर्यूषण को, पतझर का भान जरूरी है | |

यह जनकल्याण जरूरी है , जन का उत्थान जरूरी है  |

अब रामराज्य स्थापन को, रावण का हान जरूरी है | |

 

–उपेन्द्र दुबे

 

 

 

 

 

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