थामे जो हमको इसी दिल में रुक कर ,

कमसिन सी ऐसी परी ढूँढता हूँ  |

सजा जो दे पल में , सितारों कि महफ़िल ,

एक ऐसी हंसी नाजनीं ढूँढता हूँ  | |

 

झटके जो जुल्फें, तो शर्मायें बादल |

चंचल पवन सी, जो लहराए आँचल | |

पलकें उठें जो, तो रौशन जहाँ हों |

हिले लब्ज़ तो, जैसे शरगम जवां हो | |

हया कि हो मूरत शबे-रात जैसी ,

गुलशन कि खातिर , ज़मीं ढूँढता हूँ | |


एक ऐसी हंसी नाजनीं ढूँढता हूँ  ………

 

थिरके हंसी तो,  बिखरती खुशी हो ,

खुशबु से उसकी, वो जन्नत हंसी हो |

मन्नत सी मन में,  बसे हर घडी जो ,

सजदे में जिसकी,  झुकी मयकशी हो | |

उतर आयें सारे सितारे फलक से ,

जमीं  पे मैं वो चांदनी ढूँढता हूँ  | |


एक ऐसी हंसी नाजनीं ढूँढता हूँ ……….


सावन के पहली बारिश के,  जैसी दिलकशी हो ,

छा जाए नूर बनकर , कुछ ऐसी बंदगी हो  |

उसकी कशिश हो ऐसी , तासीर-ए आब-ए-जमजम ,

मक्का-ए-फलसफा सी, पाक-ए शुरुर हरदम  | |

रुतबा हुजूर सा मैं , बन पीर ढूँढता हूँ ,

जगमग दिए के जैसी , तसवीर ढूँढता हूँ | |


एक ऐसी हंसी नाजनीं ढूँढता हूँ ……

 

मैं आशिक नहीं , जो दिल-ए-हाल  कह दूं ,

शायर कहाँ , जो मैं कलमा ही गढ़ दूं  |

लिए दिल में अपने,  कशिश आरजू कि ,

खड़ा इस डगर पे,  न जाने मैं कब से  | |

पलट का गिरे,  दो नयन नूर हम पर ,

सदियों से मैं वो घडी ढूँढता हूँ  | |


एक ऐसी हंसी नाजनीं ढूँढता हूँ ………


-उपेन्द्र दुबे