अस्तांचल को जाते सूरज की सिमटती,

किरणों को कभी देखा है ?

उस ढलान में फिर से निकलने के,

उन सपनों को कभी देखा है ?

आमंत्रित रात्रि के अंधियार से ,

उन किरणों का जूझना !!!!!

कभी देखा है ?

 

देखा है अस्तित्व की उस लड़ाई को ?

अनंत विस्तार में भी उनकी उस तन्हाई को ?

डूबते वर्तमान में , भविष्य की उस अंगडाई को ?

उस भाव को, संघर्ष से जन्मे उस विश्वास को ?

देखा है उनमे संचरित होते  ललक का वो सपना ?

कि – अब जाओ निशा ये हमारा उदय है ,

सरे तम को हर लेंगे ये तय है |

हमारे अथक श्रम कि  तुम पर ये विजय है | |

 

जीतना अगर गीत है ,

तो हम उसकी लय  हैं |

एक क्षण का ये भ्रम कि ये साम्राज्य तुम्हारा है,

तुम इसकी अधिपति हो, टूटेगा !!

हम फिर से उदित होंगी ,

चमकेंगी ,

भोर कि उस पहली छटा के साथ |

और तब फिर ये सारा ब्रह्मतल हमारा होगा ,

हम इसकी सहचर होंगी | |

 

क्योंकि जीत का ये सपना हमारा बल है ,

क्यूंकि उदित होने का हमारा सूरज विकल है |

ये आज हमारा है ,

जो तुम्हारा था वो तो कल है | |

अब जाओ निशा

हम किरणों का ये आदेश अटल है

अटल है , अटल है , अटल है …..

-उपेन्द्र दुबे

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