आज प्रात की लौ जो फूटी , स्वर्णिम हुई दिशाएं  |

मन मल्हार कुछ झुमा ऐसे , प्रियतम बनी हवाएं  | |

अलसाई डाली के पत्ते , झूमर झूमर हिलते थे  |

ह्रदय गर्भ के करुण भाव , यूँ पुष्प बने खिलते थे  | |

दुल्हन पट सम आज कुहासा, मन माधुर्य छुपाता  |

हरित घांस पर पड़ा ओस बिंद , मंद मंद मुस्काता  | |

मधुबन बनी धरा मनभावनी, किरणों का श्रींगार किये  |

द्वेष गरल बनी सुधा तृप्ति की, अनुनय का उपहार लिए  | |

पंख पसारे उड़े पंखेरू, मानो  चँवर डोलाते  हों  |

कोयल की मधु कूक भी जैसे , स्वागत को अकुलाते हों  | |

आज प्रात की बेला में ,क्यूँ जाती कर्म  दीवार नहीं थे  |

बंदन अभिनन्दन में मन था,  माटी धर्म बाजार नहीं थे  | |

दिनकर सा था शांत भाव , कलरव बनती किलकारी थी  |

गुंजित था मन भ्रमर भांति , कोई कुसुम नहीं परिहारी थी  | |

अरे विधाता खोल नयन , अब आज हमें ऐसा वर दे  |

रात भली कितनी गहरी हो,  यही प्रात जग में भर दे  | |

मानवता की एक जात हो, लहू रंग बंधुत्व घने  |

हर प्रांगण मधुबन सा महके , ऐसा भारत वर्ष बने  | |

भेज भले ही कोटि कंश तू, नगर नगर मथुरा कर दे  |

एक कोख तो गढ़ प्रभु जो, अब कान्हा को पैदा कर दे  | |

मात वक्ष अब लज्जित न हो  ! !

देश धर्म अब वर्जित न हो  ! !

अहो देव नहीं अभिलाषा , हर नगर देश का अवध बने  |

नहीं चाहता ऐसा भी की , राम हरेक नर सहज बने  | |

पर मात मेरी अब आहत है  ! !

प्रबल प्रखर यह चाहत है ! !

कि …….

एक देश की एक पताका , हिमगिरी से दक्खिन तक हो

गंग जमन अभिषेक करें, नित सिंधु नीर चरणामृत हो

-उपेन्द्र दुबे 

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