जिंदगी ने जीत को कदम कदम पे लूटा है
हार हमसफ़र बनी , सफर में साथ छूटा है
आज भी कसकते दिल की दास्तां अधूरी है
उम्र की दरक में छुप ये जिंदगी जरूरी है..

थक गया पथिक जो गर , सफर कहीं पे खो गया
राहें राह भूलेंगी , पहर कहीं पे सो गया

मगर पहर के वास्ते , शहर का साथ छोड़ कर

चला है आज मन कहीं , डगर की बाट छोड़ कर

आज आह  साथ है , अधूरी आश साथ है
राह पे कदम कदम, किसी की  याद  साथ है

वक्त ही बनी कहर, ये लूट की बारात है

दिन भी आज रात है, न वास्तों की बात है

मगर उसी उम्मीद को , वो स्याह के मुरीद को

विपत तुला पे चढ कहीं, शपथ की ही तलाश है

ये लूट की बारात है ….ये लूट की बारात है …

कहूँ कहाँ किसे कहूँ
रुकूं मगर कहाँ रुकूं?

तार बन चुकी घडी ,

सदी बनी ये पल खड़ी

कफ़न सफ़ेद ओढ़ कर ये जिंदगी का रंग है

कहाँ से लाऊं  फासले बनी दुल्हन वो संग है

हौसलों की लाश पे बुलंदी का सपन बुना

मंडपों की आग से उमंगों का  दहन चुना

आज शांति सी है नहीं कहीं प्रकाश है

मरघटों के वास्ते ये जिंदगी उदास है …

मरघटों के वास्ते ये जिंदगी उदास है …

( उपेन्द्र दुबे )

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