नूर बन के हूर से, नयन नजर मिला खिली  |
पलक की आहटें लिए,  किरण कँवर की हो चली  | |
क्षणिक बना विराम जब,  गति के साथ हो गली  |
अनंत प्रेमनाद पर, प्रखर प्रणय हिली डुली  | |

सांझ साथ में लिए, दिवा मिली ढली ढली  |
पकड़ के बांह सूर्य का,  थी चांदनी धूलि धूलि  | |

पवन भी वेगहीन था, नदी भी कुछ शिथिल मिली |

न पात डाल पुष्प थे, जहाँ मिली कलि मिली | |

धरा ने त्यागा धुल जो, प्रणव से प्रेरणा  भली |

प्रबल प्रवाह हो न जो, सरित में ताल जा घुली | |

रण श्रृंगार हो चली,  कहीं पे भाल की डली |

उतार बांकुरे की लौ, जुगन कहीं पहन चली | |

उजाड़ ग्राम गोपुरम, विरह में वेदना जली |

प्रसन्नता पुकारती,  कराहती पड़ी मिली | |

प्रवर की छाँव ओढ़ कर, मलिनता सहज छली |

कुलीनता के मूल्य पर, कुटिल बनी डगर भली  | |

अनंतता की ओट में |

मिलन विरह की गोद में | |
अखंड  दीप का विनय |

अनल की नीर बन तनय | |

न आरती प्रभात की |

न गीत गाती  रात थी | |

न अश्रु छंद बन सके |

न भाव मन के हंस सके | |

प्रहार पर प्रहार कर, करूँ कहाँ मैं वार अब |

न भारती तरंग है, विहल लगे उमंग है | |

ले भावना की पाती मैं, बुझी शिखा की बाती मैं |

बुझा के दीप चल पड़ा, विचल हुआ अनल खड़ा | |

न द्वार सांझ खोलेगी, न भोर मुंह से बोलेगी |

रवि है डूबा नींद में, नहीं है कुछ शुभिंद में  | |

अदीप्त दीप्त हो चली, अनर्थ अर्थ से मिली |

बिहान को तलाशने, ये मन चला गली गली | |

बिहान को तलाशने  ये मन चला गली गली ….

(उपेन्द्र दुबे)

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