जीवन मोरी अमावस अस, कभी पूनम की मधु चाँद बनी ना |

बाहू भरी ना कभी मन से , प्रेयशी अस मोहि ये कान्त रही ना | |

पूरक ही ये रही प्रतिक्षण , अनुनंदन के रस घोल सकी ना |

मधुबन आनी के आँगन की, मोरे वटवृक्ष को तोल सकी ना | |

 

बहकी ना वसंत के आवन से, पतझर की बयार न झार सकी |

बरखा ने  सिंगार तो खूब किया , उपवन न बनी एक बार सखी | |

शुख के कलि पुष्प बने न कभी , दुःख के भली शूल न तोड़ सके |

कुलटा सी  बनी अनुभव की डगर ,भूली बिसरी नहीं छोड़ सके | |

 

सरिता की प्रवाह न साथ लिए, सर का ठहराव भी ले न सकी  |

उथली सी डगर जीवन की नदी, नहीं बांध सकी न बहा ही सकी | |

उन्मत्त हुई नहीं वेग घनी, चित्त सिंधु सामान नहीं थी रही |

जल कूप घिरी जस जीवन भर, मधुमित आकाश भी थी न सही | |

 

नहीं प्रीत अनंत बरसती कभी , नहीं मेघ कुटिलता के थे घने |

दारुण सी करुण अनुनाद लिए, अनुनेह अकारण ही थे बने | |

प्रतिबिंबित बिम्ब के आवन से , पथ साथ के भाव समाये रहे |

कल्पित तरुआयी कपोल सघन , नहीं क्षण भर भी कभी साथ चले | |

 

बरबस ही झरी नहीं निर्झर थी, बस भान बहाव का साथ लिए |

मन भाव समेटे रही प्रतिपल, नहीं स्वप्न कभी साकार किये  | |

अलसाई विरह अनुकूल लगे, प्रतिकूल न प्रेरित नेह कभी |

पग बंधित राह व्यथा की लिए , महिमूल रचित नहीं देह रही | |

–उपेन्द्र दुबे

 

Advertisements