किस्तों पे चलती दुनिया में,

जब रिश्तों के बाज़ार सजे |

अश्कों में जो डूबा घर हो,

और रश्कों पर परवान चढ़े | |

जब चंद स्वार्थ के सिक्कों पर,

ममता का मूल्य सिहरता हो  |

शिशुपान को उठते आँचल पर ,

रावन का हाथ लहरता हो  | |

मनुहार अकारण अबला सी, पुरवधू बनी फिर सजती है |

अनुनय फिर कुलटा बनी गली, हर पग के तले  कुचलती है | |

अरमानों को कंधे मिलते ,

पैमानों में लिपटे चलते |

ठोकर जीवन की ताल लगे ,

मधुमास उम्र भूचाल लगे | |

यौवन अलसाई पड़ी फिरती |

निःशक्त अशक्त बनी ढलती | |

सपनों के टुकड़े गलियों में, जब ठोकर खाने लगते हैं |

तब मधुशाला फिर मंडप बन, शुभ गीत सुनाने लगते हैं | |

छलके मदिरा फिर प्याली में ,

मदभरी रात की क्यारी में |

किन्तु न अकारण ऐसे ही ,

मन मतवाला हो जाता है |

ये वक्त है जो इंसान नहीं ,

हर गान की तान बनाता है | |

मजबूर सुरा जब दुबकी हो ,

ग़मगीन ग़मों से लिपटी हो |

मतवारी रात न मद में हो ,

अंधियार भी बैरन हद में हो |

तब मादकता खिशियती है ,

मधु मंडप भी सिसियती है | |

जब प्रेम सुधा मदिरा बन कर, शापित तर्पण करवाती है |

मनु माधव दानव बन फिरता, मरजाद दफ़न करवाती है | |

तब हर नगरी लंका बनती , अपनी विनाश लीला बुनती |

तब अधोगमन का साक्षी बन, कुलभूषण दीप बुझाता है | |

और कालचक्र की धुरी से पन्नों पर अक्षर आता है ……

-उपेन्द्र दुबे

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