अरमान दिलों के टूटे तो, पैबंद कहाँ लग पाता है

मुट्ठी में बंद समंदर हो, अनुबंध कहाँ लग पाता है

शर्तों पर गर जीना ही है, तो सपनों की मुस्कान कहाँ

जब जज्बातों की चिता जले , तब मन पाता विश्राम कहाँ

 

रिश्तों के उपवन में मैं भी, बन भ्रमर कभी गूंजा करता

मधुबन मकरंद लिए दिल में , बस गीतों में झूमा करता

अब साज ही जब सब टूट गया , बातें महफ़िल की मौन कहाँ

जब राज दिलों से फूटा हो, रिश्तों का अब फिर यौन कहाँ

 

संबंधों की तरुणाई गयी,

बातें भी बिसरी आई गयी

वो वहीँ रुके

हम दूर दिखे

पल दिन और माह बरस बीते

इसी राह पर पलभर को , कल मुड़कर जब पीछे देखा

वो यादें दौडी आती थी, उन लम्हों की गरमाहट ले

तभी कसक उठती दिल में, आँचल की वो नरमाहट ले

एक प्रश्न सहज कौंधा मन में

क्यूँ वक्त ने यूँ रौंदा क्षण में

अपने आँगन की मिटटी में

क्यूँ काँटों की सौगात बुनी

उपवन जब सम्मुख बैठा था

क्यूँ उसरता अनजान चुनी

दहलीज पे बैठा मन अब भी

प्रतिपल ये सोचा करता है

राहों पर उडती धूलों में अब तक वो ढूँढा करता है

चलने की आपाधापी में कुछ छूट बहुत पीछे जाती है

बारिश की बूँदें बरस के ज्यूँ बदरी में बाकी रह जाती हैं

कहते हैं सब खतम हो गया

पर यादें तो चलती हैं

और कभी कभी उन लम्हों को इन लम्हों के संग ले आती हैं

कभी कभी उन लम्हों को इन लम्हों के संग ले आती हैं…..

 

–उपेन्द्र दुबे

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