बमुश्किल चार हाथ की खोली, घुने हुए बांस या सरकंडे से बनी जर्जर होती दीवारें , टिन – टप्पर से बनी हिलती डुलती छत, जिसे जलकुम्भी या खजूर के सूखे पत्तों से ढँक दिया गया है , ताकि गर्मी के चिलचिलाती धुप का असर शायद थोडा कम हो जाये | न कोई खिडकी न झरोखा , बस एक छोटा सा टटरी  से बना दरवाजा , जिसमे से कम से कम कमर तक झुक कर तो आया जाया जा सके |

खोली के सामने से जाती रेलवे की ब्राडगेज लाइन और पीछे गटर का मैन होल | खोली के आधे हिस्से में भरी शहर की नालियों या कूड़े करकट के ढेरों से इकट्ठा किये गए प्लास्टिक की थैलियों से फूटती सडांध व उनसे रिसते गंदे पानी से भीगते जमीन की सीलन | बचे हुए आधे हिस्से के एक कोने में चार छह पकी ईंटों से बना एक चूल्हा , जो की अगर सप्ताह में एक दिन जलता है तो अगले दो – तीन दिनों बाद भी जलेगा या नहीं …पता नहीं |

खोली के उसी हिस्से में खजूर या ताड़ की सुखी पत्तियों या धान की पुआल बिछा कर पड़े चार छह छोटे छोटे बच्चों के साथ दो जवान मर्द और औरत | लेकिन उनकी जवानी का परिहास उड़ाती उनकी शारीरिक काया , मानो अपरिहार्य विपन्नता से निर्मित परिस्थितियों में बुढ़ापा इतना सशक्त हो गया हो की समय से पहले ही दुर्बल हो चुके शरीर में मांस की कमी का फायदा उठा कर जगह जगह शारीरिक चमड़ी को धकेल कर , बहार झांकने का असफल प्रयास करती  हड्डियां और चमड़ियों पर असमय ही पड़ गयीं झुर्रियाँ जवानी पर उसके आधिपत्य का एहसास करा रही हों |

घासलेट की ढिबरी के मद्धम रौशनी में दिन काटता ये परिवार कभी आकस्मिक आग तो कभी प्राक्रतिक आपदा का शिकार होता ही रहता है |

यह दृश्य महानगरों में बसी झुग्गी बस्तियों में बड़ी आसानी से देखा जा सकता है , जहाँ हजारों खोलियों की कतारें बमुश्किल बलिश्त  भर की चौड़ी गली से बटीं  रहती हैं  और उनमे बसता है महानगरों का शायद सबसे बड़ा वर्ग, जहाँ नृत्य करती है गरीबी, अशिक्षा , बिमारी, सामाजिक  विसंगतियाँ , यौन उत्पीडन और घुटन | और भी न जाने कैसे कैसे पारिस्थितिक उपहार प्राप्त होते हैं इस वर्ग को , जिनमे से कुछ तो विरासत में मिले होते हैं इन्हें और कुछ के लिए जिम्मेदार होता है हमारा समाज , जिन्हें जीवन भर संजो के रखना या तो इनकी मजबूरी होती है , या इनके साथ किया गया भाग्य का क्रूर एवं सबसे घिनौना उपहास |

यही ऐसा शायद एकमात्र वर्ग होता है जिसके परिवार का प्रत्येक सदस्य जन्म से ही अपने पेट की आग बुझाने के लिए संघर्ष करता है | औरत , मर्द, बुढा , बच्चा और जवान , सभी का यदि कोई एकसूत्री कार्यक्रम होता है तो वो होता है “रोटी की तलाश |

बचपन बितता है गली कूंचों में मगर खेलते  कूदते नहीं,  बल्कि नालियों में बहते गंदे पानी में हाथ डुबो कर , कुछ ऐसी चीज़ की तलाश में जो जीविकोपार्जन में सहायक हो | नीचे सरकती चड्डी को एक हाँथ से संभाले और दूसरे हाँथ से प्लास्टिक के मैले कुचैले बोरे को अपने नंगे कन्धों पर टाँगे, नाक की सुरकन को सुर्र सुर्र ऊपर खींचते ८-१० साल की उम्र के १०-१२ बच्चों के ऐसे कितने समूह महानगरों की गलियों में पौ फटते ही दिखने लगते हैं | किसी के पेट में अनाज का २-४ दाना गया भी है तो किसी के वो भी नहीं | दिन की चढान के साथ जब क्षुधा ज्यादा ही सताने  लगी तो , किसी कूड़ेदान या किसी अभिजात वर्ग के घर के पिछवाड़े पड़े कचरे के ढेर में फेंकी गयी जूठन से पेट भर लिया |

न अल्हड़ता, न हंसी, न खुशी , अभावों की एक छोर थामे बीत गया बचपन | इस तरह ये बचपन से कब जवानी में प्रवेश कर जाते हैं , इन्हें खुद भी पता नहीं चलता | और जब पता चलता है तो शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से परिवर्तित हो चुके होते हैं ये | परिपक्वता के अभाव से जूझती इन लड़के – लड़कियों की कच्ची उम्र कब इन्हें विसंगतियों के मध्य घसीट ले जाती है , इन्हें पता ही कहाँ चल पाता है | वो विसंगतियाँ इनके पहले से ही खोखली हो चुकी जिंदगी को घुन की तरह चट कर जाती हैं | कुत्सित जवानी से फिर अभिशप्त बुढापा और उसके बाद गुमनाम मौत , अर्थात जीवनलीला का समापन |बस इतनी सी ही जिंदगी होती है इनकी , और वही “आँगन भर धुप और खिड़की भर आकाश” का नाम “जीवन “होता है  इनके लिए |

न कोई सपना , न अरमान , न उद्देश्य कुछ भी तो नहीं होता इनके पास, अगर इनका अपना कुछ होता भी है तो वो होती है इनके जीने की मजबूरी | कितनी ही सरकारें आती हैं और चली जाती हैं, कितनी ही योजनाएं बनती हैं, कितने ही वायदे किये जाते हैं इनके साथ , किन्तु कुछ भी परिवर्तित नहीं होता इनके लिए , सबकुछ यथावत रहता है | हाँ अगर कुछ बदलता है तो वो ये की आज इनकी एक पीढ़ी तो कल दूसरी, परसों तीसरी, याने भोगने वाली पीढ़ीयां बदलती चली जाती हैं बस |

क्या देता है समाज इन्हें या क्या देते हैं इन्हें हम ?? हाँ अगर इन्हें कुछ मिल पाता है हमसे तो वो इनके बच्चों या जवान लड़कों  की गलतियों को देख कर हिकारत भरी नज़रों की चुभन , उपेक्षित जीवन , गन्दी और भद्दी गालियाँ  और ऐसी ही चीज़ें जो इनके जीवन को और ज्यादा विकृत कर सके | इनकी जवान लड़कियों की अधढकीं  देह को देख कर उस पर गड़ती  कामुक नज़रों की चुभन , उनकी मजबूर जवानी पर कसती फब्तियों से छलनी होता इनका ह्रदय , इनकी बहन बेटियों से किया जाने वाला भद्दा  मजाक और इन सब को देख कर उनका विरोध तक न कर पाने का आक्रोश और दर्द शायद इन्हें,  इनके कुत्सित जीवन जीने की मजबूरी से भी ज्यादा व्यथित करता होगा | इनका कुंठित और अभिशप्त जीवन कितना ह्रदय विदारक होता है इसकी परिकल्पना तक नहीं कर पाते हैं हम |

या यूँ  कहना की सोचना ही नहीं चाहते हैं हम इनके बारे में , तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |  इनकी गलतियों पर मीनमेख निकालता  हमारा समाज , काश उन  परिस्थितियों के बारे में विचार करता , जो इनमे विकार पैदा करते हैं या इनको दूर करने की जरा सी भी कोशिश करता तो शायद इनका जीवन स्तर इतना बदतर तो नहीं होता |

क्या हम इतना भी नहीं कर सकते की हमारे द्वारा दिया गया थोडा सा प्यार , थोड़ी सी सहायता और थोडा सा ही उत्साहवर्धन इनमे जीने की ललक , कुछ कर दिखाने की चाहत , जीवन का उद्देश्य और एक जिम्मेदार सामाजिक प्राणी होने का एहसास पैदा कर सके | यदि हमारे द्वारा दी गयी थोड़ी थोड़ी चीज़ें , इनमे जीवन के बड़े बड़े एहसास पैदा कर सकें तो यह उनके नारकीय जीवन से उन्हें उबारने की दिशा में एक सकारात्मक एवं सराहनीय कदम होगा और इसके बदले में हम निश्चय ही आत्मसंतुष्टि की एक अमूल्य निधि का उपहार प्राप्त कर सकेंगे |

विकास पथ पर अग्रसर हमारे भारत की सारी उपलब्धियां निश्चय ही अधूरी होंगी बिना इनकी स्थितियों में सुधार के | इसको पढकर आपमें भी उनके जीवन की मार्मिक स्थितियों का एक छोटा सा एहसास तो निश्चय ही पैदा हुआ होगा यह मेरा विश्वास है | लेकिन आपसे मेरी एक करबद्ध प्रार्थना यह है की जीवन के किसी मोड पर यदि कोई ऐसा अवसर आये की आप इनके उत्थान के लिए कुछ कर सकें तो ऐसा जरूर कीजियेगा , ताकि इनके जीवन में  भी थोडा सा प्यार , थोडा सा स्वाभिमान और थोड़ी सी इज्ज़त इन्हें मिल सके |

और मरते समय उन हाथों का स्पर्श मिल सके जो की कम से कम उन्हें अपनेपन  का एहसास तो दिलाए और इनके कपोलों पर उस समय ढलकती आंसुओं की दो बूंदों में थोड़ी सी संतुष्टि और खुशी का भाव हो , जिस से फिर से यहाँ आने की ललक का संचरण हो सके इनमे | यही हमारे द्वारा दी गयी लोकहित में सबसे बड़ी श्रधांजलि होगी |

क्यूंकि अभावों से तो लड़ा भी जा सकता है किन्तु कोई अपनी ही मानसिक कुंठा , और ह्रदय में बसे दर्द से कब तक लड़ पायेगा जो की जीवन की परिपूर्णता के बाद भी जीवन्तता को ही दूषित कर देती हैं |

–उपेन्द्र दुबे

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