तुने पलकें क्या झपकी ….मिजाज़ मौसम ने बदला
आँचल ने पवन क्या छेड़ा ….गली में हो गया बखेडा
तेरी साँसों की नमी ने, शकल कोहरे की ले ली है
कहता था यूँ मसखरी न कर, पुरवाई हड्डियों में कसकती है ,
पछुवा बनी पुरवाई , फंसी सर्दी में दिल्ली है

बहुत ठण्ड है रे बाबा …
–उपेन्द्र दुबे

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