एकाकी , तुम मेरे साथी,

बस यूँ ही बन कर रहना |

चलूँ छोड़ जब अपनी माटी,

हाथ पकड़ कर तुम चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

धागे जब विश्वास के टूटे,

आँगन  जब अधिकार के छूटे |

नाते जब बेमाने से हों,

अपने भी बेगाने से हों | |

मन की कोर पकड़ पगली सी,

कण कण में मेरे बसना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

अवरोहों का जाल बिछा हो,

जीवन पथ विकराल बना हो |

भाग्य सूर्य पर ग्रहण पड़े जब,

सखियाँ मेरी रूठ गयीं सब | |

पथराती  भी नेह अगर हो,

थकी देह और रुकी डगर हो |

लिए हाथ आशा का दीपक,

राह दिखाते संग चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

चलूँ छोड़ जग का कोलाहल,

पी कर जब सारा हालाहल |

मधुबन जब वीरान बना हो ,

घर में भी शमशान बसा हो | |

राहों की जब धुल छिटक, माथे की तिलक बने निखरे |

पावनता जब ह्रदय गर्भ से, होकर के नीचे बिखरे | |

मेरा ‘मैं’ मुझसे छूटे जब, कुटिल दर्भ आलापों पर |

जीवन की संगिनी रूठे जब, झूठे व्यर्थ प्रलापों पर | |

तब जीवन की परिभाषा बन, उस प्रयाण तक तुम चलना |

एकाकी तुम मेरे साथी …बस यूँ हि बन कर रहना …..

–उपेन्द्र दुबे

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