तुम भावों का उगता सूरज,

जन मानस पर छा जाती हो |

मैं खंडित मन का कवि मेरी,

पंक्ति बन तुम आ जाती हो | |

बनी लेखनी मन स्याही संग,

अक्षर की अवली बनती तुम |

चित्त पटल पर खाका खींचूं,

रेखा भी पहली बनती तुम | |

तुम रजनीगन्धा निशि क्षण तक,

सर सुगंध नभ धरा में भरती |

जाड़े की गुनगुनी धुप का,

आसव बन अनुपूरित करती | |

तुम मधुबन की पारिजात, मैं अपना ही परिहास लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | |

 

तुम दरिया की तेज धार मैं,

उथले जल का हूँ श्रींगार |

तुम उपवन की सघन छांव मैं,

मरुप्रदेश का लुटा गांव | |

नयनों में सपनों की छवि तुम,

मैं अश्रु बन कहीं ढलकता |

तुम अधरों की प्यास सकल हो,

मैं सूखी नद बना दरकता | |

तुम पूनम की सीत चांदनी,

दावानल की एक लपट मैं |

तुब पूरब की सूर्य रश्मि हो,

अश्तांचल की एक दहक मैं | |

तुम बसंत, स्वाति सम पावन, वर्णन मैं कई बार लिखूंगा  |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | | ……

 

तुम नंदन बगिया की देवी,

मैं झुरमुट बीहड़ उपवन का |

तुम चन्दन और मैं माटी हूँ,

तुम मधुबन, मैं शूल हूँ वन का | |

जब गति शांत बने अति निश्छल,

हलचल बन तुम आ जाती हो |

जेष्ठ माह की भरी दुपहरी,

पूर्ण मेघ बन छा जाती हो | |

बरस बनी अमृत धरती पर,

जीवन के नवरंग गिराती |

एक आश की बनी मंजरी,

सर तरंग बन कर इठलाती | |

तुम भावों की भरी गगरिया, मैं उनका मनुहार लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | | ……

 

तुम मूरत मन के मंदिर की,

मैं पत्थर एक नदी तीर का |

तुमने दर्द सहा पूजी गयी,

मैं क्या जानूं हाल पीर का | |

अंक तुम्हारे बन पुनीत,

मेरे मन हवन को पूरण कर दें |

प्रेम विनीत बने हर्षित हो,

ह्रदय भाव सब अर्पण कर दें | |

शाश्वत धवल पटल सम्मुख हो,

नयनों में कोई क्षोभ न हो |

कल जीवन की सांझ ढले जब,

अन्तः पर कोई बोझ न हो | |

तुम निधि जीवन सागर की हो, मैं जीवन संघर्ष लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | |

 

–उपेन्द्र दुबे

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