कल मेरे आँगन में पूरा,

चाँद अचानक आया था |

तारों के उस बड़े झुण्ड पर,

थोड़ा सा इठलाया था | |

मैंने कान पकड़ ली उसकी,

सोचा तुम्हे दिखाऊँगा |

पर देखो न आधा ही है,

कैसे तुम्हे रिझाऊंगा | |

कल तक बड़ा सलोना ही था,

चांदी सी ही चमक भी थी |

राह तुम्हारे चलते चलते,

कुछ मलिन सा लगा मुझे

मैंने नदी राह में देखि,

सोचा इसे यहीं धो लूँ !

ठंडी ठंडी रात भी थी , और ठंडा नदी का पानी था |

लगा कांपने छूते ही जल

मैंने सोचा धो लूँगा

पर वो धार नदी की सहसा,
तेज हुई ही जाती थी |

भागा जाता चाँद उसी पर ,

देख हुई हैरानी थी | |

झपट पकड़ मैंने उसको फिर ,

लोटे में नदी धार भरी ,

आधी धार उड़ेली उस पर ,

रगड़ रगड़ धोया मैंने ,

कुछ खँरोच भी आई मुख पर ,

जिसका दाग अभी तक है |

 

फिर पोंछा कुर्ते से अपने |

नन्हा चाँद भी लगा था हँसने  | |

चांदी सी उस नवल भोर का ,

बना लिफाफा खुद से ही ,

भरा चाँद के टुकड़े को और,

तारों की कुछ चमक भरी |

चलने लगा डगर पर अपने

झोले को काँधे पर रख

सच कहता हूँ पूस मांह की

सर्दी बड़ी निराली है

हाड़ कंपाती पुरवाई थी

पर लगती मतवाली है

रात स्याह की डगर खतम हुई

अब पहुंचा हूँ तुम तक मैं

नन्हा रवि भी झाँक रहा था

गगन स्वर्ण की खिडकी से

खोल लिफाफा बंद भोर का

चाँद हाथ में थाम लिया

पर आँखों में आंसू आ गये

देख उसे आभा विहीन

धुले हुए इस चाँद से अच्छा

भला था मेरा वो मलीन

हो रुआंस उस बाल सूर्य से

मुट्ठी भर किरणें मांगी

उस उधार की किरण मली

मैंने उस चंद के मुखड़े को

तब देता हूँ भेंट मैं तुमको

उसी चाँद के टुकड़े को

मधुबन में कोयल थी कूकी

आधी कुक मैं भर लाया

सोचा संग चाँद के दूंगा

पता नहीं तुमको भाया

मुझे पता है नहीं भायगा ,

धूसर सा भौंडा मुखडा

पर क्या करता नवल गगन में

मुझे मिला बस ये टुकड़ा

हर आगंतुक वर्ष चमक को

गया वर्ष सब खोता है

नए चाँद की हंसी को देखो

यही चाँद तो रोता है

उसी चमक का एक अंश

तुमको ये अर्पण करता है

नवजीवन को आज तुम्हारे

खुद का तर्पण करता है

अब छोडो अट्टी कट्टी

उठो आज अब मुंह धो लो

देखो नया ब्रह्मतल सारा

स्वागत को अकुलाया है

चलो चाँद को रौशन कर दे

नया वर्ष अब आया है

 

–उपेन्द्र दुबे(३१/१२/२०११)

अंबिकापुर से ….