कल रंगों की क्यारी में,
न जाने कितने ही रंग खिलेंगे ?
उस नन्हे सिमटे आँगन में,
न जाने कितने ही रंग गिरेंगे ?
दहलीज़ रंगी होगी कुछ से,
कुछ से दीवारें रंग जाएँगी |
कुछ हथेलियाँ गालों पर तो,
कुछ तुमको भी नहलायेंगी | |

ये रंग पर्व की बात तुम्हारा,
मन मटमैला करती होगी |
जब यादों की नन्ही गुडिया,
श्वेत तर्जनी धरती होगी | |
रोती होगी तुम भी छुपकर,
कमरे के उस कोने में |
जब गुलाल की डली बिखरती,
होगी स्वप्न सलोने में | |

पर दूर यहाँ इस दामन में,
क्या कम यादें बिखरेंगी ?
क्या ये रंग उनसे कम होगा,
जो तुमको कल रंग देंगी ?

उन रंगों की खातिर मुझको,
इस बार वही होली भेजो |
उन यादों में लिपटी उन्हीं,
रंगों की एक डोली भेजो | |

मैं भेज रहा हूँ तुमको , तुम भी मुझको होली भेजो ….

आज यहाँ पर उसी डगर पर,
खड़ा दूर अपने घर से |
नैना हैं किस पर टिकी हुई,
रंग ढूंढ रहीं जाने कब से | |
खाली पिचकारी हाथों में,
अब भी रंगों को तरसे है |
ये दामन ही क्यूँ कोरा है,
जब शहर में सब रंग बरसे हैं ??

इन रंगों से क्या नाता है ?
कोई रंग कहाँ अब भाता है?
छूट गयी अपने रंग की,
वो पिचकारी उन हाथों में |
उन मीठी बिसरी बातों में ,
वो दूर वहीँ उन साथों में | |

उन हाथों की शौगंध तुम्हें, इस बार वही रोली भेजो
मैं भेज रहा हूँ तुमको, तुम भी मुझको होली भेजो

–उपेन्द्र दुबे

रंगपर्व होली की हार्दिक शुभकामनाएं…..