कल भी नभ पर तारों का झुण्ड,

छिपमछिपाई खेल रहा था |

आसमान से दूर ओट में,

चंदा गुमशुम झेल रहा था | |

अलसाई कुछ पस्त पवन थी |

तन्हाई कुछ मस्त मगन थी | |

पग बोझिल, गरमी के दिन थे |

नैनों में कुछ आंसू कम थे | |

 

कदम सीढियों से जीने के |

छत पर थे बरबस जा पहुंचे | |

 

तब टीटही  चकोर से बोली |

सुन सुनाऊँ तुझको हमजोली | |

 

तू ये जो टकटकी लगाये, चंदा की है बाट जोहता |

क्या है ऐसा उस टुकड़े में, जो तेरा यूँ मन है मोहता ???

कुछ दिन में सावन बरसेगा |

तन मन और यौवन हरसेगा | |

मादकता मेघों में घुलकर, वसुधा का मनुहार भरेगी |

कुछ बच कर नभ के टुकड़ों में, चंदा का श्रींगार करेगी | |

धवल प्रियतमा के आँचल में, दुबक तुझे फिर नहीं तकेगा |

तू यूँ ही चितवन संग पगले, विरह प्रीत क्या ऐसे सहेगा ???

सच कहती हूँ….

 

मैं गाऊंगी तू निहारना |

चंदा को तू छोड़ ताकना | |

खुशियों की डफली ठोकेंगे |

नहिं कभी ऐसे रूठेंगे | |

 

तब चकोर ने नज़र घुमाई |

मंद मंद पहले मुस्काई | |

रे टीटही …

रे टीटही तू ना समझेगी |

ज्वार अगन की क्या परखेगी ??

सावन जो तू नाप रही है, नम समीर की बोझलता से |

नैनों के आंसू घुल गए हैं, बरसेंगे कल समरसता से | |

प्रीत देह की नहीं रे टीटही , जीवन का रसरंग छुपा है |

मधुबन के आँगन में रहती, क्या उसमे ही स्वर्ग बसा है ??

 

सुन बतिया मेरा मन डोला |

धीरे से मुझसे फिर बोला | |

यूँ मुट्ठी में रेत बांध

क्यूँ नाहक परेशान किया है ??

यूँ घुट के छत पर चलने से |

क्या जीवन वरदान हुआ है ????

सच कहती हूँ , चल चलते हैं …

 

चल चिड़ियों के पंख पकड़ हम, दूर गगन तक हो कर आयें |

चल तितली का रंग ओढ़ हम, फूलों में कुछ यूँ छुप जायें | |

इन्द्रधनुष के सात रंग में ,

हम अपनी खुशियाँ ढूँढेंगे |

तू कुछ रंग जेब में भरना, मैं कुछ से मुट्ठी भर लूँगा |

कुछ फिर भी बाकि गर बच गए ,

दोनों ओढ़ साथ चल देंगे | |

रात चढेगी वहाँ सांझ जब,

हम दोनों तारे तोड़ेंगे |

चंदा संग बदरी में छुपकर,

खूब देर तक हम खेलेंगे | |

गर तुझको जो ठण्ड लगेगी, बादल के फाहे ओढेंगे |

रात वहीँ रुक हम दोनों फिर, कहीं गगन में छुप सो लेंगे | |

सुबह सूर्य की कुछ किरणें ले |

फिर हम वापस घर लौटेंगे | |

घर रौशन होगा तारों से,

दीवारें किरणों से होंगी |

फिर टीटही  चकोर की बोली,

नहीं सुनेंगे हम हमजोली | |

फिर टीटही चकोर की बोली, नहीं सुनेंगे हम हमजोली ….

–उपेन्द्र दुबे (०५-०४-२०१२)

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