कोलतार की काली चिकनी सड़क,

उस पर सरपट भागती मेरी बस |

बस में सहकर्मियों का एक रेला

रेले की पिछली सीट पर , मैं बिलकुल अकेला |

पता नहीं ये जीवन क्यूँ है इतना मैला ……..

 

बस की खिड़की के बाहर,

एक भरा पूरा संसार |

फिर क्यूँ और कैसी , लगी है इतनी भागमभाग ????

भीड़ को धकियाते , एक दूजे में पिलते लोग,

उसमे ही धंसने को, हर कोई लगा रहा था जोर |

 

कुछ एकाकी थे |

बहुतों के साथी भी थे |

ढलती बेला थी |

सबकुछ बिलकुल लगती मेला थी | |

कुछ दूर उसी सड़क पर, भीड़ कम हुई जाती थी |

हिस्सा छूटता था, जैसे ही कोई गली आती थी | |

 

अब चंद लोग ही नजर आते थे,

जैसे खुद में ही सिमटते जाते थे

सहसा मेरी बस ने हारन फूंका

और तब जा के मेरा ध्यान टुटा |

 

रोज की तरह आज भी, मेरे उतरने की जगह आई थी |

अब सड़क पर मेरे संग बस मेरी तन्हाई थी |

अब सड़क पर मेरे संग बस मेरी तन्हाई थी….

 

–उपेन्द्र दुबे(२०/०४/२०१२)

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