मैंने पूछा रात खनकती, दिन में शोर भला क्यूँ है
जीवन है रंगीन धरा तो, मन में चोर भला क्यूँ है

कुछ तो बोलो, मुंह तो खोलो ऐसे चुप बैठी हो क्यूँ

क्यूँ नदिया के तीर बैठ यूँ, ताल बनी बहकी हो तुम

गलबहियां कल तक थी डाले, आज नज़र क्यूँ खिंच रही

नयन झील में कमल थे जब कल, क्यूँ अँखियाँ तुम भींच रही

बातों कि चादर अब बोझिल

लुटने को आतुर थे दो दिल

लब  की फडफड कानों में घुल, जीवन रंग जला क्यूँ है

मैंने पूछा रात खनकती, दिन में शोर भला क्यूँ है

मेरी ऊँगली थाम के अब तक, चंदा की बतकही सुनी,

उलझे मन की टूटी बातें, थाम के तुमने स्वप्न बुनी

कल तक रातें मुझसे तंग थीं

एकाकी बांहें संगदिल थीं

आज कफ़न जब छूट चला तो, स्याह सफ़ेद बना क्यूँ है

मैंने पूछा रात खनकती, दिन में शोर भला क्यूँ है

देखो न गलियां हैं बोली

साँसों के हैं संग हमजोली

सुनो गीत अश्रु बनते हैं

दिल के दर्द खड़े हँसते हैं

अब छोडो तुम हंसी ठिठोली

ऐसे न लौटाओ डोली

मैं शब्दों के जाल बुनूंगा

तुमसे शब्द शब्द गढ़ लूँगा

अब तो मानो,

मुझको जानो

मेरे दिल की उजड़ी गलियां

अब भी जीवन को तरसें हैं

नज़र फेर एक पल जो देखा

अगहन में बदरा बरसे हैं

होठों की कंपकपी पढूंगा

अपना जीवन छंद लिखूंगा

तुमसे ही प्रारंभ करूँगा

अब तुमसे ही इति गढूंगा

अब देखो तुम मान भी जाओ

ऐसे न मुझको तड़पाओ

यूँ हाथों की फ़ैल पसारे

आँगन में तारे अब हारे

उठो नयन की आशा दे दो

जीवन की परिभाषा दे दो

देखो पौ फटने को आया

जल में भी उतरी है छाया

चिड़ियों की चिचियाहट गूंजी

प्रहर रात की पड़ी हैं औंधी

उठो मीत अब नयन तो खोलो

ऐसे क्यूँ रूठे हो बोलो

क्यूँ साँसों की डोरी तुमसे छूटन को व्याकुल लगती है

क्यूँ रातों की नींद पकड़ने को तुमसे आकुल लगती है

संबंधों की साँझ ढली जब, मन तुम ओर चला क्यूँ है

मैंने पूछा रात खनकती, दिन में शोर भला क्यूँ है

–उपेन्द्र दुबे(०६/०५/२००१२)

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