बेबस तमन्नओं से घिरे,

मुफलिसी के वो गम ,

दामन में उनके समेटे ,

कुछ दूर चले थे हम .

दो कदम का वो साथ ,

और उनकी वो दरियादिली ,

एक तलक को ऐसा लगा

जैसे हमनफस  हो आ मिली ,

शहर से हो गयी मुहब्बत

कुछ इस गुमान में ,

सोचा आशियाना ज़मीन में क्या ,

बनायेंगे संग उनके आसमान में,

शहर की गलियां, इमारतों का जंगल

धुल मिटटी में सनी, रोजमर्रा की बातें

सबकुछ अपना सा लगता था

अपना गांव, और वो लोग तो बस,

एक छूटा सपना सा लगता था

उनकी उँगलियों की वो छुवनमेरी मुट्ठी की पकड़ से अब छूटती सी जाती हैं

अब वो शहर, गालियाँ, हाट और लोग

रुपहले धुवें सी, बस धुंधला सी जाती हैं

फर्श से अर्श की वो दास्ताँ न हो सकी पूरी ,

इस शहर से मोहब्बत हमारी रह गयी अधूरी,

पूरी करने की न अब चाह है न छोड़ने का गम ,

परिंदे थे और रहेंगे , न रुके हैं और न रुकेंगे हम ,

भटके थे कभी उनके पहलू में, वो भी एक दौर था

खुद को देख आज सोचते हैं , वो हम नहीं कोई और था

अंधियारी रात बड़ी भाने लगी थी

सबकुछ बस आने जाने लगी थी

आंसुओं की नमी, तकिये की कोरों को भिगोने में लगी थी

सूनापन कुछ तनहा, फिर होने सी लगी थी

डूबते उतराते हम, बस दिन रात का दौर था

अब सोचते हैं, नहीं नहीं वो हम नहीं सच में कोई और था

आसमान को नापने का ज़ज्बा अब फिर नज़र आता है ,

उस शहर की क्या बात करें दोस्त अब तो ये पूरा संसार ही हमे शहर नज़र आता है

 

–उपेन्द्र दुबे(०८/०५/२०१२)