आज की रात कुछ ज्यादा ही स्याह थी

तभी तो तारे कुछ ज्यादा चमक रहे थे छत पर

किसके हिस्से की थी वो रौशनी ???

और किसके हिस्से की वो स्याह रात ???

क्या तुम्हे पता है ???

तपती छत,

छत की मुंडेर पर जमी धुल

और उनके दरारों में समाती मेरे मन की बातें

लगता हैं फंस कर रह गयी थी उनमे

शायद पिघलती चली गयीं उस तपन में

कुछ धुवाँ सा निकला और छा गया इर्द गिर्द

पर अब तक मैं उनमे कुछ ढूंढता हूँ ?

क्या तुम्हे पता है??

पंखे की चकरघिन्नी घूम रही है कमरे में

घुर्र घुर्र की आवाज टकरा रही है कानों में

आँखें पथरा सी गयीं है उन पर

बल्ब की टिमटिमाती रौशनी

गरमा रही है मेरे कमरे को

पर मन काँप रहा है,

जैसे तुम्हारे साथ उस सांझ को आया ज्वर अब तक ना गया हो

क्या तुम्हे पता है ???

गली का वो एकलौता कुत्ता आजकल ज्यादा भौंकता है

न जाने कौन सी परछाई उसे दिख पड़ती है,

सहसा इस अंधियारी रात में !!!!

फिर अचानक शांत भी हो जाता है,

शायद कोई पुरानी छाया अब तक है उसके जेहन में

जो पीछा कर रही हों उसका

वो भी कहाँ सो पाता है अब रातों को

क्या तुम्हे पता है ???

अपनी बालकनी के आगे वो नीलगिरी का पेड़ अब भी है

वैसा ही सफ़ेद तना हुआ

उसकी पत्तियां वैसे ही छूती हैं दीवारों को

पर उसकी घिरनी अब नाचती नहीं

बस लुढकती है इधर से उधर

उसकी पिपरमेंट वाली खुशबू भी शायद कुछ कम हो गयी है

शायद उसकी नमी भी मेरी आँखों की तरह सूख गयी है

क्या तुम्हे पता है ???

दिन भी कुछ मटमैला ही गुजरता है आजकल

तभी तो अहाते में रखे उन्हीं गमलों के गुलाब

अपनी पंखुडियां जल्दी गिरा देते हैं

उतने शुर्ख भी नहीं रहे अब वो

बस कांटे हैं जो डालियों पर बिखरे पड़े हैं

शायद हर सांझ अब पतझर आती है

जो सुबह के नन्हे बसंत को रोज ही समेट ले जाती है

तुम्हारे दुपट्टे का वो टुकड़ा अब भी गमलों पे तना है

फड़फड़ता भी है, बिलकुल उन्ही दिनों की तरह

पर अब पौधों पर उस से छन कर आने वाली धुप तेज हो गयी है

कई जगह भी फट चूका है और कोनों पर लगे डंडे भी सर निकले झांकते है

कुछ दिनों में वो भी बिखर जायेगा

अपने संबंधो की तरह

फिर कोई नया दुपट्टा भी नहीं है

बस वो डंडे बचेंगे अपनी यादों की तरह

पर तुम्हे नहीं पता होगा …है न !!!!!!

मुझे पता है …..

मैं न कहता था की मुझे पता है ……..

मुझे पता है …..

उपेन्द्र दुबे (११/०५/२०१२)

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