कल तुमने कहा था मुझसे बात न करना

आज कहती हो गली से न गुजरना

कल कहोगी सपनो में मुखबिरी क्यूँ करते हो

लोगों के सामने मेरी किरकिरी क्यूँ करते हो

कुछ दिन पहले ही तो कहा था न ….कि

“गलियों की धुल सरगोशियाँ करती हैं मेरे कानों में

तुम्हारे चुप रहने का नाटक, खामोशियाँ करती है दुकानों में”

तुमने कहा मेरी प्रीत चुभती है

आँखों में मेरी  बेवफाई दिखती है

और भी न जाने वो कौन से अलफ़ाज़ थे

बुरे स्वप्न थे या तुम्हारे जीने के अंदाज़ थे

मैं सुनता रहा

अपनी ही धुन बुनता रहा

सोचता था ए आज की बात है

कल नया होगा बस थोड़ी और रात है

उम्मीद थी की तुम समझोगी

आज नहीं ,शायद कल कुछ कहोगी

पर न तुम बदली, न मैं बदला

पलों का कारवां पहला

उनके उड़ते गुबार में मुझे ही खोना था

तुम्हे तो बस किसी और की होना था

पर शायद अंदाज़ा नहीं था

जख्म गहरा था, पर ताजा नहीं था

आज सांझ नदी के उसी तट पर तुम्हारा आना

मेरे कंधे को धीरे से थपथपाना

मेरी नज़रों का तुम पे फिर से गिरना

और मेरे हाथों का तुमसे मिलना

सोचा सब बदल गया

पर ए गुमान भी जैसे छल गया

कागज के वो टुकड़े जिसे मैंने खत समझा था

तुम्हारी मुट्ठी में छटपटा रहे थे

जैसे छूटने  से पहले कुछ कसमसा रहे थे

कितना सपाट कहा था तुमने …ए टुकड़े मुझे बोझ लगते हैं

इन्हें संभालो मुझे खुदगर्ज़ लगते हैं

कहाँ उठ पाए थे मेरे हाथ उन्हें थामने को

तभी तो तुमने फेंका था उन्हें नदी  में….और चल दी थी कभी न आने को

मैं पथराया देखता चला गया था  उनका बहना

नहीं रोका था तुमको भी मैंने …है ना !!!

पर पता है ….

उस दिन कागज के टुकड़े वो तैरेते जाते थे, डूबे नहीं थे

उछलते कूदते बहुत दूर तक भागे थे, ओझल होंने तक रुके नहीं थे

नदी ने भी उन्हें अपने किनारों पर छोड़ा नहीं था

भर लिया था अपने अंक में , ऐसे तो मुंह मोड़ा नहीं था

सच कहता हूँ वो डूबे नहीं थे …तैरे थे बहुत दूर तक

बोलो न फिर कैसे बोझ थे वो ….

बोलो न …..कैसे बोझ थे वो

बोलो न …..

–उपेन्द्र दुबे (२५/०५/२०१२)

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