कुछ रीत बनी, कुछ मीत बनी,
कुछ बातें मेरी प्रीत बनी

कुछ रातों में, कुछ साथों में

कुछ बातें मेरी गीत बनी
कुछ रीझ गए, कुछ खीझ गए
कुछ बातों में मेरी भीग गए

कुछ साथ रहे, कुछ दूर खड़े

कुछ बातें भी संगीत बनी
कुछ रोती और रुलाती गयीं ,

कुछ गाते गयीं, हंसाते गयीं  

कुछ सबको साथ बुलाते गयीं

कुछ साथों को उलझाते गयीं

कुछ शब्दों का जंजाल बनी ,

कुछ रिश्तों कि एक छांव घनी
कुछ मन में थी, कुछ तन में थी
कुछ जीवन के मधुबन में थी
कुछ पन्नों पर गहराती थी
कुछ मन में ही रह जाती थी

कुछ मिलती थीं , कुछ खिलती थीं
कुछ रातों में भी झिलमिल थी

कुछ यादों का संसार बनी

कुछ लम्हों का उपहार बनी

 

उन बातों का नन्हा टुकड़ा, इन शब्दों में भी सिमटा है

मन के भावों कि एक झलक, इस पन्ने पर भी बिखरा है

ए और बात है बातों के, कुछ रंग अधूरे से होंगे

कुछ मन में आज उतर कर भी, तस्वीर से पूरे न होंगे

पर टुकड़े तुम तक पहुंचे हैं, तुम में पूरे हो जाने को

कुछ अन्तः तक भी उतरेंगे, छू लेने को उन भावों को

जिन भावों कि दहलीज़ पे तुम, अब तक छिप छिप कर रोती हो

आंसू कपोल पर ढलते तो, छींटे अंसुवन कि धोती हो 

 

हम आज गहन अंतरमन में, उन बातों कि तन्हाई लिए

सुखी स्याही कि एक चमक, उन लम्हों को तरुणाई दिए

कुछ वही द्वन्द उन बातों में ,जो साथों कि अरुणाई बनी

कुछ उलझी बिखरी साँसें थीं, क्या तुमने थी उस रात सुनी ??  

अब बातें ही बस बातें है, जो तुमसे बस टकराती हैं

अनुगूँज बनी मुझ तक प्रतिपल, बस दौडी वापस आती हैं

–उपेन्द्र दुबे(२३/०६/२०१२) 

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