दो रोटी कि निपट सफेदी, चाँद बाँध कर सोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

चाँद उतरता कहीं तवे पर

कहीं अमावस होता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

आँचल में सूखे दो स्तन,

मैला आँचल, मैला सा तन

सपनों के कुछ टूटे तारे

आँखों में बसते हैं सारे

सीवर कि पटियों के उपर

भारत भाग्य संजोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

एन पी टी कि धवल बोरियां

उजले मन को ढोती है

पिछवाड़े कि वही झोपडी

दिन होने को रोती है

कहीं रात रौशन ढिबरी से

कहीं भाग्य लिपटा कथरी से

रेशम पर पैबंद बना एक

टाट सांझ को खोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

खेतों में अब दरक पड़ गए

शाखों से पत्ते भी झड गए

मैदानों में सुखी घान्सें

बूदों को अटकी थी सांसें

ढोर, बैल,खेती खलिहानी,

चिल्लाते थे पानी पानी

सूरज कि गरमी झुलसाती

कुछ उधार कि लपट जलाती

पगड़ी बन फांसी का फंदा

जीवन कि लौ कर गयी मंदा

 

पर कल कि कुछ बात अलग थी

रातों में वो रात अलग थी

टिन के टप्पर पर टपटप हुई

आँगन में थोड़ी छप छप हुई

झमाझम बरसी तब बरखा

मन में पर कुछ अलग सा डर था

क्या ए भी सपना कोई सच था ????

कुछ किसान हँसते थे जाते

कुछ नैनों से नीर बहाते

काँधे पर अब हल तन गए थे

बैलों के बगने खुल गए थे

खेतों में माटी थी महकी

झोपड में जीवन थी बहकी

तवा कटोरा लोटा बल्टी

देते थे बूंदों को उलटी

नहीं फिकर थी चाँद चमक कि

रोटी कि फिर किसे गरज थी

बंधी पोटली आटे कि तब

उछल गिरी चन्दा के मुंह पर

दो हाथों कि फ़ैल देख लो

इन भूखों कि ठेल देख लो

नंगे पेटों का ए जलसा, भारत में ही होता है???

एक गली में नंगा बच्चा बिन रोटी के रोता है

दो रोटी कि निपट सफेदी चाँद बाँध कर सोता है

–उपेन्द्र दुबे(२१/०७/२०१२)

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