कुछ पहलु मैंने भी बुने थे, रंगीन खवाबों के उस सुर्ख क्यारी में
पर दरारों के बीच मनो फंस के रह गए वो
कभी निकल ही नहीं पाए,
अकुलाहट उनकी थी या उन दरारों की
न उस समय पता था, न आज पता है
पर एक आवाज ने तब भी उस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश की थी
पर हुआ कुछ नहीं
सुना किसी ने नहीं
जहाँ तहां अब भी गूंजती हैं वो
कभी रातों के कोरों पर, तो कभी बातों  की छोरों पर

हवाओं में घुलती भी हैं कुछ

पर पहुँच नहीं पाती कहीं
एक अजीब सा फलसफा है
बनता बिगड़ता ..हर पल जैसे जुड़ने को बेताब
लेकिन आज तक एक कड़ी न जुड़ सकी

पर फिर भी मकदूम की अल्फाजों में आज भी तकरीबन हर पल बयां होता है
जाने क्या है ..जब की दीखता कुछ नहीं और न ही सुनाई पड़ता है
पर सुनने और देखने को पूरा सैलाब उमड़ता है

एक अरसा गुज़र गया ..कुछ दिन पहले कम्मो मौसी की श्राद्ध में पता चला
हाथों की लकीरें अब जगह जगह टूटने लगी है
पैरों में बिवाई ठण्ड के बाद भी रहती है
चमड़ी पर झुर्रियों ने जैसे बस्ती सी बसा ली हो
दिन का उजाला न ढलता है, न निकलता है
शायद रात से उसका बैर अब ख़तम हो चूका है

छत पर तारे न अब टिमटिमाते हैं, न टूटते हैं

चाँद भी कहाँ सिकुड़ता है अब कोनों पर

मेरे खाट के नीचे रखे टीन का कटोरा जब तब कुत्ता चाट जाता है
हो सकता है उम्र का तकाजा हो ..या फिर वक़्त की बेबसी
पर मेरे चश्मे ने अपना नंबर अब तक नहीं बदला

लेकिन डंडियों की जगह हरे कतरनों ने ले ली है

–उपेन्द्र दुबे (१४/२/२०१३)

Advertisements