यहाँ पर उतर रही हैं साँझ, तुम्हारे आँगन में
वहां से सुबक के काली रात चली होगी
यहाँ पर  मटमैला हो रहा तुम्हारा साथ
वहां पर किरणों की बरसात हुई होगी

कहो न तुम कैसे हो आज

जहाँ पर नग्मे बुनते साज

वहां हर महफ़िल सजती है

यहाँ बंजारा हर दिल है
यहाँ पर  चन्दा तारे साथ
वहां पर सूरज की शौगात
यहाँ पर चिचियाते पंछी
वहां पर उड़ने को संगी
यहाँ अब बंद हुई हर बात
वहां पर खुलने लगे कपाट
यहाँ पर  गगन छोर , कुछ  लाल हुआ सा जाता है
वहां वो लाल रंग कुछ  दुल्हन सा शरमाता है

यहाँ पर अंतहीन कुछ बातें अब भी हैं

वहां पर मिलने को कुछ सांसें अटकी हैं

अन्तर मिलते बहुत यहाँ पर,

बंद रात की कलियों में

वहां दिवस पर यौअन चढ़ता,

खुली सुनहरी गलियों में

बचपन का कोई रंग नहीं है

यहाँ वहां का संग नहीं है

यहाँ पसरता अंत अंत है

आदि वहां का पूज्य संत है
आदि अंत के इसी वृत्त में,  मैं भी हूँ तुम भी हो

उसी त्रिज्य की छोर थाम, लगते तुम कुछ कुछ गुम हो

शुभ्र स्याह पूरक दूजे के,  हर एक में दिखती  है

यहाँ वहां फिर भी एकाकी ,  विधि विरह लिखती है

नश्वर मन की शाश्वत बातें,  कभी कभी अकुलाती है

यहाँ वहां की एक कहानी,  तब पन्नों पर आती है

–उपेन्द्र दुबे (१७/०५/२०१३)

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