अधूरी कविता।।।

2 टिप्पणियाँ


शब्दों ने अवकाश लिया जब,
भावों का संघर्ष चला ।
शिथिल देह और स्थिर मन था,
जीवन का संघर्ष ढला ॥
साँझ क्षितिज पर पंछी रोते,
रेतों पर बिखरी थी मीन ।
नदिया सूनी, पोखर सुने,
रातें थीं थोड़ी ग़मगीन ॥
सच कहता हूँ बहुत मगन थी,
सुने आँगन की दहलीज ।
चौखट पर खुशियां रुक गयी थीं,
देख तमाशा बड़ा अजीब ॥
और पतीले खूब खनकते,
बासी उन पकवानों से ।
जहाँ सबेरा साहस लाता,
उन बूढ़े मेहमानों से ।
बच्चे गुम थे खेल कूद में,
बात समझ में आती थी ॥
मगर जवानी पस्त पड़ी थी,
नहीं यहाँ इठलाती थी ।
मतवाला मद होश उड़ाता,
खेतों में खलिहानों में ॥
परिभाषा इंसान की बदली,
जीवन था मयखानों में ।
यह निर्ममता क्यों कायल थी,
सुने इन विरानों में ।
जहाँ पड़ी चीत्कार कराही,
दिन दुपहर शामियानों में ॥
देख तमाशा इस मंजर का,
तर्पण करने आते थे ।
कुत्ते पिंड पाक की दावत,
करते नहीं अघाते थे ॥
अब भी रूप नहीं बदला है,
साँझ क्षितिज पर होती है ।
सूरज का वो रथ नहीं ढलता,
माँ की लोरी रोती है ॥
और कौन से शब्द गढूं मैं,
जो इसको पूरी कर दे ।
इस नैराश्य साथ की बेला,
एकाकी के संग भर दे ॥
आज अधूरी बातें होंगी,
और अधूरी यह सविता ।
शब्दों के वीरानेपन पर,
जाने कब पूरी होकविता ॥

-उपेंद्र दुबे
३१/०५/२०१६

Advertisements

ज़िंदगी …

टिप्पणी करे


ढलते सूरज की रोशनी का बोझ

डूबते उतराते उनके साथ कहीं गुम जाने की सोच

लुटती गहराइयों में घुल जाने की बेबसी

बिखरती ज़िंदगी पर पसरी एक अनजानी हँसी

शाश्वत एकांत से गलबहियां डाले नश्वर कोलाहल

सर्वत्र फैलता एक अजीब सा हालाहल

मिटते पैरों के निशान

आँसुओं में धुलते अनेक बेजुबान

कुछ कहा जाता है

बहुत कुछ अनकहा कहीं गुम जाता है

अपने शहर में अजनबी लोग

बेजान सी सख्शियत, अनजाना संयोग

दूर कहीं कुछ सिसक सी रही है

कुछ तो है जो अब तक टसकती कहीं है

ढूंढने की कोशिश युगांतर पर खड़ा करती है

ज़िन्दगी अपनी बरबादी शायद खुद ही गढ़ा करती है

तभी तो पलों का ये कारवाँ हर पल लूटा करता है

कुछ पाने का जनाज़ा काँधे चढ़ा करता है

सबकुछ पल में बुना हो, तो मन की दशा है

नहीं तो पलों की ये त्रासदी, शायद एक दुर्दशा है

इन्हे संजोने की क्रिया ज़िंदगी

खो जाने का भय बेबसी

संघर्स का साहस शायद जीवटता

और बिखर जाने की शिकन मृत्यु की कर्मठता

न जाने कब कहाँ किससे किस पल भेंट हो

जीवन का न जाने कैसा कब परिवेश हो

भाव शब्दों में बंधने को अकुलाते हैं

बंधता कहाँ कुछ, बस सब पीछे छूट जाते हैं

इस रंगमंच पर शायद सबकुछ तय है

मगर फिर भी इस व्यंजना में एक लय है

तभी तो पात्र अपनी भूमिका तन्मयता से निभाता है

नहीं तो पटाक्षेप कहाँ किसको भाता है।

 पटाक्षेप कहाँ किसको भाता है.…।

 –उपेन्द्र दुबे

(२४ / ०२ / २०१५ )

अनकहा…कुछ कुछ

टिप्पणी करे


कुछ पहलु मैंने भी बुने थे, रंगीन खवाबों के उस सुर्ख क्यारी में
पर दरारों के बीच मनो फंस के रह गए वो
कभी निकल ही नहीं पाए,
अकुलाहट उनकी थी या उन दरारों की
न उस समय पता था, न आज पता है
पर एक आवाज ने तब भी उस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश की थी
पर हुआ कुछ नहीं
सुना किसी ने नहीं
जहाँ तहां अब भी गूंजती हैं वो
कभी रातों के कोरों पर, तो कभी बातों  की छोरों पर

हवाओं में घुलती भी हैं कुछ

पर पहुँच नहीं पाती कहीं
एक अजीब सा फलसफा है
बनता बिगड़ता ..हर पल जैसे जुड़ने को बेताब
लेकिन आज तक एक कड़ी न जुड़ सकी

पर फिर भी मकदूम की अल्फाजों में आज भी तकरीबन हर पल बयां होता है
जाने क्या है ..जब की दीखता कुछ नहीं और न ही सुनाई पड़ता है
पर सुनने और देखने को पूरा सैलाब उमड़ता है

एक अरसा गुज़र गया ..कुछ दिन पहले कम्मो मौसी की श्राद्ध में पता चला
हाथों की लकीरें अब जगह जगह टूटने लगी है
पैरों में बिवाई ठण्ड के बाद भी रहती है
चमड़ी पर झुर्रियों ने जैसे बस्ती सी बसा ली हो
दिन का उजाला न ढलता है, न निकलता है
शायद रात से उसका बैर अब ख़तम हो चूका है

छत पर तारे न अब टिमटिमाते हैं, न टूटते हैं

चाँद भी कहाँ सिकुड़ता है अब कोनों पर

मेरे खाट के नीचे रखे टीन का कटोरा जब तब कुत्ता चाट जाता है
हो सकता है उम्र का तकाजा हो ..या फिर वक़्त की बेबसी
पर मेरे चश्मे ने अपना नंबर अब तक नहीं बदला

लेकिन डंडियों की जगह हरे कतरनों ने ले ली है

–उपेन्द्र दुबे (१४/२/२०१३)

मेरा देश ..आपका गणतंत्र

3 टिप्पणियाँ


एक धरती, दो भाग

एक में पानी, दूजे में आग

ज़मीन के टुकड़े बंटे,

उनमे एक मेरा देश

हजारों जाती, अनेकों भेश

करोड़ों लोग, करोडो मन, अनेक तन

पर कहलाते सभी जन

जन का जनाधार

बनाता है सरकार

उसमे एक राजा, सैकड़ों मंत्री

खाली खजाना, लाखों संतरी

करों का अध्यारोपण दिन पर दिन होता है

रजा रजाई में, और मंत्री उड़न खटोले पर सोता है

गरीबी है, भुखमरी है

आज का ये अंदाज़, नया है

कहीं होठों तो कहीं आखों से बयां है

अमीरी गाती है, गरीबों को हंसाती है

सबकुछ दीखता है

पर अपने बाप का क्या बिकता है

आधार गायब, जनता अजायब

अब तो यहाँ जन ही जन को धोता है

अबे, कहाँ कौन किसके लिए रोता है

बस दो दिन का मंचन

फिर दृश्य बदला, वही तन दूजे नयन

बुक और फेस का संयोजन

सिमट रहे कई योजन

अब तो देश का खाका वहीँ खींचता है

दूकान का क्या कहें दोस्त, वहां तो खरीददार भी बिकता है

प्रेम उल्लास इसी, बुक का स्टेटस अपडेट है

फेस चिपका है, बोली लगाओ, पूछो कितना रेट है

नया ज़माना, नए लोग, नयी पसंद

कहीं पर तुलसी, कहीं मकरंद

केसर की खुशबू कहीं खेतों से आती है

तो कहीं बंदूकों की सुलग धमकाती है

दोनों पडोसी फिर भी भाई हैं

क्या फरक पड़ता है

एक बकरा, दूसरा कसाई है

कभी कभी तो बाड़े पर ही गर्दन कटती है

पर फिर भी ईद की मिठाई, बड़े मजे से बंटती है

आतंकवाद रंगों में बंटता है,

कहीं भगवा तो कहीं हरा सफ़ेद दीखता है

टोपी और साफे का मिलन हर समारोह में होता है

एक के हाथों में खंजर दूजे की पीठ पर सोता है

मेज पर राजा नवाब तक़रीबन हर रोज मिलते है

साला, दावतों पर लाखों पीलते हैं

पान की पीक में दबी कमीनगी,कभी कभी भडवे का अकल भी लेती है

पर शांतिकाल साली, युद्ध का शकल कभी नहीं लेती है

शांतिप्रिय ज़मीन का ये टुकड़ा, मेरा भारत देश है

क्यूंकि यहाँ की अनोखी शांति, जीवन का सन्देश है

ये और बात है कि ,हर गली में शांति टुकड़ों में बंटती है

कहीं कहीं घरों के पीछे, लाल रंग में दिखती है

आये दिन इस शांति का चिर हरण होता है

सड़कों पर नंगी होती कभी सीता, तो कभी मनमोहन रोता है

शांति का बलात्कार भी होता है, अमूमन हर दिन हर शहर में

मोमबत्तियों की शकल में चीत्कार भी होता है, हर दिल हर नज़र में

पर फिर भी जनतंत्र है

गण का अधिकार, यह महामंत्र है

भूखे लोग सोडा पीते है

क्रिकेट के चौकों पर एक पल को जीते हैं

उन पलों का हिसाब मुट्ठी भर लोगों के जेबों में गिरता है

क्यूंकि मेरे दोस्त यहाँ सबकुछ बिकता है

कुछ दिनों बाद आनेवाले शनिवार को एक पर्व फिर मनेगा

गणतंत्र के नाम पर फिर से सर्व लूटेगा

यह वर्ग ही सर्वहारा है

तभी तो हँसता, हँसता, हर कोई बेचारा है

नंगे लोग शामियानों में सजेंगे

ढोल नगाड़ों के बीच जलसे मनेंगे

फलक पर करतब भी अजब होगा

पर कौन जाने क्या गज़ब होगा

शीशों की आड़ में शांति के रखवाले

सपनों का सौदा कागजों पर करेंगे

स्याही का रंग लाल और सफ़ेद कफ़न ध्वजों पर सजेंगे

कफ़न के वो दलाल बिरयानी का मज़ा भी कुछ साल लेंगे

फिर एक दिन चुपके से अख़बारों में चल देंगे

फाँसी की दलाली अपने हद तक चढ़ेगी

तभी तो देश में फिर से नयी शांति बढ़ेगी

अमन की इस दूकान में कुछ बलात्कारी पकवान कडवे होंगे

कुछ दिनों तक फिर आन्दोलनों की होड़ में थोड़े झगडे होंगे

फिर  एक आई पि एल का सीजन आएगा

छोटे स्कर्ट में सब छिप जायेगा

आधार का एक कार्ड भी बनने लगा है

क्यूंकि दारू में रंगे  मुर्गों का दन्भ कम्बल में ढलने लगा है

ये ऐसा ही चलेगा

तभी तो देश में शांतिपर्व मनेगा

प्रेषित अग्रिम बधाई आपको भी करता हूँ

वीचलित हंसी के साथ हर्षित आपका ये गणतंत्र कहता हूँ

ठंडी साँसों में भी एक गरमाहट हो

प्रार्थना के साथ मुर्दों के बिच भी थोड़ी आहट हो

क्यूंकि छाती माँ की ही फटती है

चूड़ियाँ विधवावों के हाथों में कहाँ सजती है

पायलों की छनक गोलियों में गुम हुई जाती हैं

फिर भी साल में दो बार ये पर्व मनाई जाती है

मैं आपका ये गणतंत्र हर्षित करता हूँ

और भारत का ये स्वतंत्र आपको समर्पित करता हूँ

भारत का ये स्वतंत्र आपको समर्पित करता हूँ

–उपेन्द्र दुबे

मैं अकेला…..

8 टिप्पणियाँ


मैं अकेला, पथ मुझे, ले चल समेटे धुल में

रह गए जो रहगुजर तक, क्या मज़ा है फूल में

कारवां जो साथ कल तक, था यही उस मोड पर

साथी थामे हाथ संग थे, जिंदगी के छोर तक

उस हंसी मौसम की मस्ती, दूर सोती है कहीं

उस घने जंगल की हस्ती, चूर होती है यहीं

आज पतझर फिर चढ़ी है, बावरी बन डाल पर

और पवन आँचल समेटे, सांवरी सी चाल पर

आज हलचल सी मची, हर ओर कुछ पुरजोर है

जैसे सावन की घटा में, हो छुपी कोई भोर है

रात ही थी एक काली, साथ अब तक दे रही

आज अब इस मोड पर, वह भी सिमटती खो रही

दिन भयानक रौशनी संग, दौड़ता सा आ रहा

हर परत तम का हटाता, तोड़ता सा जा रहा

फिर वही बदरंग चहरे, कलिखों की कोख पर

आँखों के आगे फिरेंगे, कातिलों की नोक पर

और कतल हल्दी का होगा, कुमकुमों के घाट पर

रोलियों की भाल फिर, चन्दन चढेगी हाट पर

 

अब नहीं पाथेय, पथ पर,

दौड़ता घनघोर रथ पर

काल का पहिया चला है

ध्यान का यौवन ढला है

कांपती वो उंगलियां अब

ढोती हैं भुजदंड बरबस

लपलपाती है सहेली

काटती जीवन पहेली

चल पकड़ कुछ दूर ले चल

इस गली से दूर हर पल

रात फिर कहीं ढल न जाये

ये दिवा एक पल न भाये

चल प्रवर बन कर समा ले

जिंदा हूँ जिंदा बुला ले

दौड़ती हर पल अकिंचन, कुछ तो है कहीं खो रहा

जिंदगी यूँ मौत की ,बाहें पकड़ कर रो रहा

 

सारथी बनता पतन अब, मन जूता बन अश्व है

वल्गा थामे क्रूरता अब, हंस चली सर्वत्र है

बादलों का एक कतरा, है पिघलता भूल में

बावरी मधुबन समझ बैठी, शरद को शूल में

 

मैं अकेला, पथ मुझे ले चल समेटे धुल में …..

मैं अकेला, पथ मुझे ले चल समेटे धुल में …..

 

–उपेन्द्र दुबे

(१५/०४/२०१२)