यहाँ.. वहां…

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यहाँ पर उतर रही हैं साँझ, तुम्हारे आँगन में
वहां से सुबक के काली रात चली होगी
यहाँ पर  मटमैला हो रहा तुम्हारा साथ
वहां पर किरणों की बरसात हुई होगी

कहो न तुम कैसे हो आज

जहाँ पर नग्मे बुनते साज

वहां हर महफ़िल सजती है

यहाँ बंजारा हर दिल है
यहाँ पर  चन्दा तारे साथ
वहां पर सूरज की शौगात
यहाँ पर चिचियाते पंछी
वहां पर उड़ने को संगी
यहाँ अब बंद हुई हर बात
वहां पर खुलने लगे कपाट
यहाँ पर  गगन छोर , कुछ  लाल हुआ सा जाता है
वहां वो लाल रंग कुछ  दुल्हन सा शरमाता है

यहाँ पर अंतहीन कुछ बातें अब भी हैं

वहां पर मिलने को कुछ सांसें अटकी हैं

अन्तर मिलते बहुत यहाँ पर,

बंद रात की कलियों में

वहां दिवस पर यौअन चढ़ता,

खुली सुनहरी गलियों में

बचपन का कोई रंग नहीं है

यहाँ वहां का संग नहीं है

यहाँ पसरता अंत अंत है

आदि वहां का पूज्य संत है
आदि अंत के इसी वृत्त में,  मैं भी हूँ तुम भी हो

उसी त्रिज्य की छोर थाम, लगते तुम कुछ कुछ गुम हो

शुभ्र स्याह पूरक दूजे के,  हर एक में दिखती  है

यहाँ वहां फिर भी एकाकी ,  विधि विरह लिखती है

नश्वर मन की शाश्वत बातें,  कभी कभी अकुलाती है

यहाँ वहां की एक कहानी,  तब पन्नों पर आती है

–उपेन्द्र दुबे (१७/०५/२०१३)

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मैं रोज गुजरता रहता हूँ …

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आहों में कराहों में,
उन रूठी हुई निगाहों में
अभिशप्त शप्त परवाहों में
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

दग्ध रात की बाँहों में
कुछ उजड़ी सी उन राहों में
न सोता हूँ न रोता हूँ
बस टूटे वक़्त संजोता हूँ
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

एक चादर सी बिछ जाती है
जब रात याद वो आती है
उस चादर के टूटे धागे
पैबंद में सिलते रहते हैं
जाने क्या कुछ कुछ कहते हैं

न वो समझें न मैं समझूं
फिर किससे क्या भला कह दूं
अनजाना सा बस मौन सा है
जाने पहचान ये कौन सा है
बस इसी गाँठ में उलझ सुलझ
हर रोज उलझता रहता हूँ
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

कुछ खोया था लुट जाने को
कुछ पाया था गुम जाने को
वो दोनों परदे उठे हुए हैं
कोरों पर कुछ फटे हुए हैं
फड़फड़ की वो दस्तक अक्सर रोज रात को होती है
एक मौज कहीं की तनहा तनहा दुबक साथ में सोती है

गुमशुम चिल्लाती है कानों में
जाने क्यूँ अकुलाती है
पकड़ हाथ जब कारण पूछूं
धीरे से सकुचाती है
उहापोह की कलि पुष्प है
अमन चैन की डली रुष्ट है
सघन उजाड़ मुदित मधुबन है
विरह विकल बस दो चितवन है
उसी मंजरी की करवट में
कुछ पाता खोता रहता हूँ
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

–उपेन्द्र दुबे (१४/०५ /२०१३ )

अनकहा…कुछ कुछ

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कुछ पहलु मैंने भी बुने थे, रंगीन खवाबों के उस सुर्ख क्यारी में
पर दरारों के बीच मनो फंस के रह गए वो
कभी निकल ही नहीं पाए,
अकुलाहट उनकी थी या उन दरारों की
न उस समय पता था, न आज पता है
पर एक आवाज ने तब भी उस सन्नाटे को तोड़ने की कोशिश की थी
पर हुआ कुछ नहीं
सुना किसी ने नहीं
जहाँ तहां अब भी गूंजती हैं वो
कभी रातों के कोरों पर, तो कभी बातों  की छोरों पर

हवाओं में घुलती भी हैं कुछ

पर पहुँच नहीं पाती कहीं
एक अजीब सा फलसफा है
बनता बिगड़ता ..हर पल जैसे जुड़ने को बेताब
लेकिन आज तक एक कड़ी न जुड़ सकी

पर फिर भी मकदूम की अल्फाजों में आज भी तकरीबन हर पल बयां होता है
जाने क्या है ..जब की दीखता कुछ नहीं और न ही सुनाई पड़ता है
पर सुनने और देखने को पूरा सैलाब उमड़ता है

एक अरसा गुज़र गया ..कुछ दिन पहले कम्मो मौसी की श्राद्ध में पता चला
हाथों की लकीरें अब जगह जगह टूटने लगी है
पैरों में बिवाई ठण्ड के बाद भी रहती है
चमड़ी पर झुर्रियों ने जैसे बस्ती सी बसा ली हो
दिन का उजाला न ढलता है, न निकलता है
शायद रात से उसका बैर अब ख़तम हो चूका है

छत पर तारे न अब टिमटिमाते हैं, न टूटते हैं

चाँद भी कहाँ सिकुड़ता है अब कोनों पर

मेरे खाट के नीचे रखे टीन का कटोरा जब तब कुत्ता चाट जाता है
हो सकता है उम्र का तकाजा हो ..या फिर वक़्त की बेबसी
पर मेरे चश्मे ने अपना नंबर अब तक नहीं बदला

लेकिन डंडियों की जगह हरे कतरनों ने ले ली है

–उपेन्द्र दुबे (१४/२/२०१३)

मेरा देश ..आपका गणतंत्र

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एक धरती, दो भाग

एक में पानी, दूजे में आग

ज़मीन के टुकड़े बंटे,

उनमे एक मेरा देश

हजारों जाती, अनेकों भेश

करोड़ों लोग, करोडो मन, अनेक तन

पर कहलाते सभी जन

जन का जनाधार

बनाता है सरकार

उसमे एक राजा, सैकड़ों मंत्री

खाली खजाना, लाखों संतरी

करों का अध्यारोपण दिन पर दिन होता है

रजा रजाई में, और मंत्री उड़न खटोले पर सोता है

गरीबी है, भुखमरी है

आज का ये अंदाज़, नया है

कहीं होठों तो कहीं आखों से बयां है

अमीरी गाती है, गरीबों को हंसाती है

सबकुछ दीखता है

पर अपने बाप का क्या बिकता है

आधार गायब, जनता अजायब

अब तो यहाँ जन ही जन को धोता है

अबे, कहाँ कौन किसके लिए रोता है

बस दो दिन का मंचन

फिर दृश्य बदला, वही तन दूजे नयन

बुक और फेस का संयोजन

सिमट रहे कई योजन

अब तो देश का खाका वहीँ खींचता है

दूकान का क्या कहें दोस्त, वहां तो खरीददार भी बिकता है

प्रेम उल्लास इसी, बुक का स्टेटस अपडेट है

फेस चिपका है, बोली लगाओ, पूछो कितना रेट है

नया ज़माना, नए लोग, नयी पसंद

कहीं पर तुलसी, कहीं मकरंद

केसर की खुशबू कहीं खेतों से आती है

तो कहीं बंदूकों की सुलग धमकाती है

दोनों पडोसी फिर भी भाई हैं

क्या फरक पड़ता है

एक बकरा, दूसरा कसाई है

कभी कभी तो बाड़े पर ही गर्दन कटती है

पर फिर भी ईद की मिठाई, बड़े मजे से बंटती है

आतंकवाद रंगों में बंटता है,

कहीं भगवा तो कहीं हरा सफ़ेद दीखता है

टोपी और साफे का मिलन हर समारोह में होता है

एक के हाथों में खंजर दूजे की पीठ पर सोता है

मेज पर राजा नवाब तक़रीबन हर रोज मिलते है

साला, दावतों पर लाखों पीलते हैं

पान की पीक में दबी कमीनगी,कभी कभी भडवे का अकल भी लेती है

पर शांतिकाल साली, युद्ध का शकल कभी नहीं लेती है

शांतिप्रिय ज़मीन का ये टुकड़ा, मेरा भारत देश है

क्यूंकि यहाँ की अनोखी शांति, जीवन का सन्देश है

ये और बात है कि ,हर गली में शांति टुकड़ों में बंटती है

कहीं कहीं घरों के पीछे, लाल रंग में दिखती है

आये दिन इस शांति का चिर हरण होता है

सड़कों पर नंगी होती कभी सीता, तो कभी मनमोहन रोता है

शांति का बलात्कार भी होता है, अमूमन हर दिन हर शहर में

मोमबत्तियों की शकल में चीत्कार भी होता है, हर दिल हर नज़र में

पर फिर भी जनतंत्र है

गण का अधिकार, यह महामंत्र है

भूखे लोग सोडा पीते है

क्रिकेट के चौकों पर एक पल को जीते हैं

उन पलों का हिसाब मुट्ठी भर लोगों के जेबों में गिरता है

क्यूंकि मेरे दोस्त यहाँ सबकुछ बिकता है

कुछ दिनों बाद आनेवाले शनिवार को एक पर्व फिर मनेगा

गणतंत्र के नाम पर फिर से सर्व लूटेगा

यह वर्ग ही सर्वहारा है

तभी तो हँसता, हँसता, हर कोई बेचारा है

नंगे लोग शामियानों में सजेंगे

ढोल नगाड़ों के बीच जलसे मनेंगे

फलक पर करतब भी अजब होगा

पर कौन जाने क्या गज़ब होगा

शीशों की आड़ में शांति के रखवाले

सपनों का सौदा कागजों पर करेंगे

स्याही का रंग लाल और सफ़ेद कफ़न ध्वजों पर सजेंगे

कफ़न के वो दलाल बिरयानी का मज़ा भी कुछ साल लेंगे

फिर एक दिन चुपके से अख़बारों में चल देंगे

फाँसी की दलाली अपने हद तक चढ़ेगी

तभी तो देश में फिर से नयी शांति बढ़ेगी

अमन की इस दूकान में कुछ बलात्कारी पकवान कडवे होंगे

कुछ दिनों तक फिर आन्दोलनों की होड़ में थोड़े झगडे होंगे

फिर  एक आई पि एल का सीजन आएगा

छोटे स्कर्ट में सब छिप जायेगा

आधार का एक कार्ड भी बनने लगा है

क्यूंकि दारू में रंगे  मुर्गों का दन्भ कम्बल में ढलने लगा है

ये ऐसा ही चलेगा

तभी तो देश में शांतिपर्व मनेगा

प्रेषित अग्रिम बधाई आपको भी करता हूँ

वीचलित हंसी के साथ हर्षित आपका ये गणतंत्र कहता हूँ

ठंडी साँसों में भी एक गरमाहट हो

प्रार्थना के साथ मुर्दों के बिच भी थोड़ी आहट हो

क्यूंकि छाती माँ की ही फटती है

चूड़ियाँ विधवावों के हाथों में कहाँ सजती है

पायलों की छनक गोलियों में गुम हुई जाती हैं

फिर भी साल में दो बार ये पर्व मनाई जाती है

मैं आपका ये गणतंत्र हर्षित करता हूँ

और भारत का ये स्वतंत्र आपको समर्पित करता हूँ

भारत का ये स्वतंत्र आपको समर्पित करता हूँ

–उपेन्द्र दुबे

जिंदगी तो जश्न है…

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खून का दरिया बहा है,

जिस्म भी बिखरा पड़ा है |

और पवन उन्मत्त अब भी,  झूम कर है गा रही

गंध ए बारूद की,  किसकी सुलग से आ रही

जल रहा है क्या यहाँ,  चूल्हों में कोई असलाह है ??

या कहीं खंजर ले हाथों में,  खड़ा सैलाब है  ??

कुछ कहो कुछ तो बताओ,
क्यूँ गली में शोर है ???

क्यूँ महकती वादियों में,

आ घुसा कोई चोर है ???

कल शहर की उस हवेली में,  मरा एक श्वान था

सुर्खियाँ बन के खबर, चर्चा वो शहर-ए-आम था

आज क्यारी लाल है,

चूड़ियाँ बेहाल हैं

बेटियों की अस्मतें, जब लुट रहीं हर चौक पर

क्यूँ खबर अखबार की,  भड़वा बनी है नोट पर ???

दूरदर्शन पर प्रदर्शन,

अधखुली  देहों के दर्शन

और मुहल्लों के घरों में, बस टपकती लार है

क्या बहन और नारियों की, जिंदगी बाजार है ???

पर अचानक उस गली में, कुछ नज़ारा और था

और समय की चाल पर, एक सभ्यता का जोर था

अधखुली नंगी धडें थीं

खोखली करती जडें थीं

और बदन की गर्मियां, शर्दी को करती नर्म थी

कौन कहता है की एक,  औरत का गहना शर्म थी

भूख से बच्चा बिलख कल, मर गया सुनसान में

बाप उसका ओढ़ बैठा, जिंदगी शमशान में

लोग कहते थे, गरीबी भुखमरी का जोर है

बदहवासी को समेटे, जिंदगी कमजोर है

पर यहीं गोदाम में, गेहूं की बोरी सड़ गयी

कागजों पर अन्न की, भण्डार क्षमता बढ़ गयी

भूख शायद झूठ है

बाग बनता ठूँठ है

और ए फितरत बागबाँ कि, दिल का दरवाजा खुला

ठूँठ के मधुबन पे देखो, हर खजाना लुट गया

शान्ति कि वार्ता, चलती रही महलों में ही

ध्वज लहरता है किले पर, साल में दो बार भी

कुछ करोड़ों का ए जलसा, शान मेरे हिंद कि

झूठ है सीमाओं पर बहता लहू, लुटती हुई हर जिंदगी

चार तांबे के वो तमगे, डाल कर उस भाल पर

कर अदा कीमत कफ़न की, है तमाचा गाल पर

खुश है हम तो क्या गिला है??

जैसे हम वैसा सिला है!!!

कौन कहता है यहाँ, चिंगारियां धधकी कभी

जिंदगी जब मौत से, हर पल यहाँ सस्ती लगी

हर तरफ बस प्रश्न है

प्रश्न भी कुछ नग्न है

क्या यही बस प्रश्न बन, बारूद सा कुछ जल रहा ???

और यूँ  ठंडी राख से, छंटता धुवाँ सा पल रहा ???

या सुलग निशक्त सी, बस गंध ले कर आ रही ??

जो अधूरी आपसे कुछ, पंक्तियाँ समझा रही

क्या पता कल कि सुबह कुछ,  फिर अँधेरी सी लगे

आपमें भी प्रश्न ऐसा,  कुछ अधिक बन कर जगे

तो सवालों कि ए बस्ती, कुछ अधिक गुलज़ार होगी

जिंदगी कुछ इन सवालों को,  लिए बेजार होगी

तो सवालातों के मंज़र, कुछ हंसी बन कर सजेंगे

मन में उठते हर भवंर बस,  धार बन कर न रहेगे

बस यही एक स्वप्न है

फिर जिंदगी तो जश्न है

जिंदगी तो जश्न है

उपेन्द्र दुबे(२३/०७/२०१२)

 

 

 

चाँद ..या..रोटी …

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दो रोटी कि निपट सफेदी, चाँद बाँध कर सोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

चाँद उतरता कहीं तवे पर

कहीं अमावस होता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

आँचल में सूखे दो स्तन,

मैला आँचल, मैला सा तन

सपनों के कुछ टूटे तारे

आँखों में बसते हैं सारे

सीवर कि पटियों के उपर

भारत भाग्य संजोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

एन पी टी कि धवल बोरियां

उजले मन को ढोती है

पिछवाड़े कि वही झोपडी

दिन होने को रोती है

कहीं रात रौशन ढिबरी से

कहीं भाग्य लिपटा कथरी से

रेशम पर पैबंद बना एक

टाट सांझ को खोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

खेतों में अब दरक पड़ गए

शाखों से पत्ते भी झड गए

मैदानों में सुखी घान्सें

बूदों को अटकी थी सांसें

ढोर, बैल,खेती खलिहानी,

चिल्लाते थे पानी पानी

सूरज कि गरमी झुलसाती

कुछ उधार कि लपट जलाती

पगड़ी बन फांसी का फंदा

जीवन कि लौ कर गयी मंदा

 

पर कल कि कुछ बात अलग थी

रातों में वो रात अलग थी

टिन के टप्पर पर टपटप हुई

आँगन में थोड़ी छप छप हुई

झमाझम बरसी तब बरखा

मन में पर कुछ अलग सा डर था

क्या ए भी सपना कोई सच था ????

कुछ किसान हँसते थे जाते

कुछ नैनों से नीर बहाते

काँधे पर अब हल तन गए थे

बैलों के बगने खुल गए थे

खेतों में माटी थी महकी

झोपड में जीवन थी बहकी

तवा कटोरा लोटा बल्टी

देते थे बूंदों को उलटी

नहीं फिकर थी चाँद चमक कि

रोटी कि फिर किसे गरज थी

बंधी पोटली आटे कि तब

उछल गिरी चन्दा के मुंह पर

दो हाथों कि फ़ैल देख लो

इन भूखों कि ठेल देख लो

नंगे पेटों का ए जलसा, भारत में ही होता है???

एक गली में नंगा बच्चा बिन रोटी के रोता है

दो रोटी कि निपट सफेदी चाँद बाँध कर सोता है

–उपेन्द्र दुबे(२१/०७/२०१२)

कुछ बातें मेरी …

13 टिप्पणियाँ


कुछ रीत बनी, कुछ मीत बनी,
कुछ बातें मेरी प्रीत बनी

कुछ रातों में, कुछ साथों में

कुछ बातें मेरी गीत बनी
कुछ रीझ गए, कुछ खीझ गए
कुछ बातों में मेरी भीग गए

कुछ साथ रहे, कुछ दूर खड़े

कुछ बातें भी संगीत बनी
कुछ रोती और रुलाती गयीं ,

कुछ गाते गयीं, हंसाते गयीं  

कुछ सबको साथ बुलाते गयीं

कुछ साथों को उलझाते गयीं

कुछ शब्दों का जंजाल बनी ,

कुछ रिश्तों कि एक छांव घनी
कुछ मन में थी, कुछ तन में थी
कुछ जीवन के मधुबन में थी
कुछ पन्नों पर गहराती थी
कुछ मन में ही रह जाती थी

कुछ मिलती थीं , कुछ खिलती थीं
कुछ रातों में भी झिलमिल थी

कुछ यादों का संसार बनी

कुछ लम्हों का उपहार बनी

 

उन बातों का नन्हा टुकड़ा, इन शब्दों में भी सिमटा है

मन के भावों कि एक झलक, इस पन्ने पर भी बिखरा है

ए और बात है बातों के, कुछ रंग अधूरे से होंगे

कुछ मन में आज उतर कर भी, तस्वीर से पूरे न होंगे

पर टुकड़े तुम तक पहुंचे हैं, तुम में पूरे हो जाने को

कुछ अन्तः तक भी उतरेंगे, छू लेने को उन भावों को

जिन भावों कि दहलीज़ पे तुम, अब तक छिप छिप कर रोती हो

आंसू कपोल पर ढलते तो, छींटे अंसुवन कि धोती हो 

 

हम आज गहन अंतरमन में, उन बातों कि तन्हाई लिए

सुखी स्याही कि एक चमक, उन लम्हों को तरुणाई दिए

कुछ वही द्वन्द उन बातों में ,जो साथों कि अरुणाई बनी

कुछ उलझी बिखरी साँसें थीं, क्या तुमने थी उस रात सुनी ??  

अब बातें ही बस बातें है, जो तुमसे बस टकराती हैं

अनुगूँज बनी मुझ तक प्रतिपल, बस दौडी वापस आती हैं

–उपेन्द्र दुबे(२३/०६/२०१२) 

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