गुजारिश …

1 टिप्पणी


कहीं है आग का दरिया,

कहीं शोलों कि बारिश है

समंदर कि तपिश समझों,

ये मौजों कि गुजारिश है

घने बादल बरसते हैं

कहीं पर दिल तरसते हैं

कहीं मदहोशियों कि कुछ अदायें याद आती हैं

कहीं सरगोशियाँ छुप के, वफाओं को हंसाती  हैं

कहीं पैगाम आँखों से, दिलों को चीर कर खोती

कहीं धड़कन कि दस्तक पर, जवानी रात भर रोती

छलक जब जाम है चढ़ती, सुहानी बंद गलियों में

कसम से आग लग जाती, यहाँ कमसिन कलियों में

जरा उस आग से कह दो, यहाँ मौसम कि साजिश है

समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है

यहाँ  बातों के रेलों से,

शहर वीरान सजते हैं

तबेले ज़िंदगी के जब ,

झमेलों से गुजरते हैं

शहर कि सुन्न गलियों में,

मकां  पैगाम देता है

खुली छत के झरोखों से,

ये मंजर आम होता है

शिफा-ए -मौत से कुछ ज़िंदगी करती सिफारिश है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है

अभी वीरानियों पे कुछ,

दीवारें दर्प करती थीं

कफ़न ढांचों पे लिपटा कर,

बदन को गर्म करती थीं

सिहर कर चांदनी, मजमूनियत पर मुस्कराती थी

शहर शमशान में सोते हुए एक गीत गाती  थी

रवानी ज़िंदगी की, हर कदम गुलशन सजाती है

मुहब्बत झील सी, बस हर तरफ किस्सा सुनाती है

उसी गुलशन कि अर्ज़ी से, फलक लिखता तवारीख है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौसम कि गुजारिश है

 

धधकता कुछ दबा सा आज, सीने में दहकता है

ढली हुई साँझ के उस छोर पर, सूरज चमकता है

सितारे टूट कर आँगन में, अब भी रोज गिरते हैं

कसक छोटे से दामन कि, फलक तक साथ फिरते हैं

मगर रुशवाईयां ही हर कदम, गुलजार होती है

उजड़ कर आज ये बस्ती, शरम से तार होती है

उसी बस्ती कि सरहद पर, सबेरा छुप के रोता है

अँधेरा आज गलियों में दुबक कर खूब सोता है

सुबकती हर तरफ बस आज अरमानों कि डोली है

कहीं माथे चढ़ी है राख, बस करती ठिठोली है

सजी इस आरती में बदनसीबी, एक अदा सी है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है

 

–उपेन्द्र दुबे(०१/०२/२०१४)

संवेदनहीन पटकथा …

10 टिप्पणियाँ


लुटी सी आबरू का तकाजा
जिन्दा अरमानों का जनाजा
मुस्कराता निष्ठुर राजा
भांडों का बैंड बाजा
कुछ काल की लचक थी
सांसें अटकी सी वो हलक थी
आंसुओं का मोल था
जीवन शायद झोल था
तभी तो बादलों का फटना, आंसुओं की बाढ़ ले आया था
कल तक जहाँ घण्टे बजते थे, आज मुर्दों का साया था

बेचारगी कुछ कुछ ठुमकती थी
बेहया बड़ी बेरहमी से हंसती थी
खींसे निपोरते चंद लोग
बाकी पिलते हुए संजोग
घढ़ियाली आंसुओं का रिवाज था
बेजान बदन से उतारा जाता लिबास था
नाटक और सच का रंगमंच है
शायद दुनिया ही प्रपंच है
तभी तो लाशों के टुकड़े काटे जाते थे
और एहसानों की दरियादिली ऐसी की अख़बारों में इश्तहार छप के आते थे

कसाई भी शुतक का शोक मनाता है
हंसी ख़ुशी और आडम्बर से लोक लजाता है
डायन भी सात घर छोडती है
अपने घर के सदस्यों को जोडती है
लोमड़ी, शियार, कुत्ते इन सब की भी एक मर्यादा है
कर कुटुंब की मौत पर बहते इनके भी आंसू ज्यादा है
परन्तु इन सब से ऊपर मैं इंसान हूँ
ऐसी दकियानुशी बातों से परेशान हूँ
तभी तो बर्बादी का बाज़ार सजाता हूँ
और उसकी एक दूकान पर मंगल गीत गाता  हूँ

चिता की आंच पर रोटी सेकने का ये चलन
मुर्दों की ठण्ड से बुझते हवस की जलन
कुछ की दबी हुई हंसी
कुछ की जान है फंसी
कुछ जीवन दान में समर्पित है
कुछ उन पर अपनी दूकान में अर्पित हैं
अजब सा चलचित्र है
जिसमे सबकुछ विचित्र है
शोक शंतप्त मैं भी हूँ कैसे कहूं
क्यूंकि दिनचर्या वही है, वहीँ मैं भी हूँ
पर शायद देख रहा हूँ इस चलचित्र को पिछले कुछ दिनों से
तभी तो भावशून्य सा लगता है सबकुछ बिना इन नगिनों के
तीन तरह के नायकजिनकी नियति ने इस चलचित्र को अमर किया
मृत, जीवित, और जिजीविषा के यज्ञ में जिसने आहुति दिया
जाने कब तलक याद आयेंगे
या ये भी और चीज़ों की तरह यूँ ही भुला दिए जायेंगे

उपेन्द्र दुबे(२७/०६/२०१३ )

यहाँ.. वहां…

2 टिप्पणियाँ


यहाँ पर उतर रही हैं साँझ, तुम्हारे आँगन में
वहां से सुबक के काली रात चली होगी
यहाँ पर  मटमैला हो रहा तुम्हारा साथ
वहां पर किरणों की बरसात हुई होगी

कहो न तुम कैसे हो आज

जहाँ पर नग्मे बुनते साज

वहां हर महफ़िल सजती है

यहाँ बंजारा हर दिल है
यहाँ पर  चन्दा तारे साथ
वहां पर सूरज की शौगात
यहाँ पर चिचियाते पंछी
वहां पर उड़ने को संगी
यहाँ अब बंद हुई हर बात
वहां पर खुलने लगे कपाट
यहाँ पर  गगन छोर , कुछ  लाल हुआ सा जाता है
वहां वो लाल रंग कुछ  दुल्हन सा शरमाता है

यहाँ पर अंतहीन कुछ बातें अब भी हैं

वहां पर मिलने को कुछ सांसें अटकी हैं

अन्तर मिलते बहुत यहाँ पर,

बंद रात की कलियों में

वहां दिवस पर यौअन चढ़ता,

खुली सुनहरी गलियों में

बचपन का कोई रंग नहीं है

यहाँ वहां का संग नहीं है

यहाँ पसरता अंत अंत है

आदि वहां का पूज्य संत है
आदि अंत के इसी वृत्त में,  मैं भी हूँ तुम भी हो

उसी त्रिज्य की छोर थाम, लगते तुम कुछ कुछ गुम हो

शुभ्र स्याह पूरक दूजे के,  हर एक में दिखती  है

यहाँ वहां फिर भी एकाकी ,  विधि विरह लिखती है

नश्वर मन की शाश्वत बातें,  कभी कभी अकुलाती है

यहाँ वहां की एक कहानी,  तब पन्नों पर आती है

–उपेन्द्र दुबे (१७/०५/२०१३)

मैं रोज गुजरता रहता हूँ …

5 टिप्पणियाँ


आहों में कराहों में,
उन रूठी हुई निगाहों में
अभिशप्त शप्त परवाहों में
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

दग्ध रात की बाँहों में
कुछ उजड़ी सी उन राहों में
न सोता हूँ न रोता हूँ
बस टूटे वक़्त संजोता हूँ
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

एक चादर सी बिछ जाती है
जब रात याद वो आती है
उस चादर के टूटे धागे
पैबंद में सिलते रहते हैं
जाने क्या कुछ कुछ कहते हैं

न वो समझें न मैं समझूं
फिर किससे क्या भला कह दूं
अनजाना सा बस मौन सा है
जाने पहचान ये कौन सा है
बस इसी गाँठ में उलझ सुलझ
हर रोज उलझता रहता हूँ
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

कुछ खोया था लुट जाने को
कुछ पाया था गुम जाने को
वो दोनों परदे उठे हुए हैं
कोरों पर कुछ फटे हुए हैं
फड़फड़ की वो दस्तक अक्सर रोज रात को होती है
एक मौज कहीं की तनहा तनहा दुबक साथ में सोती है

गुमशुम चिल्लाती है कानों में
जाने क्यूँ अकुलाती है
पकड़ हाथ जब कारण पूछूं
धीरे से सकुचाती है
उहापोह की कलि पुष्प है
अमन चैन की डली रुष्ट है
सघन उजाड़ मुदित मधुबन है
विरह विकल बस दो चितवन है
उसी मंजरी की करवट में
कुछ पाता खोता रहता हूँ
मैं रोज गुजरता रहता हूँ

–उपेन्द्र दुबे (१४/०५ /२०१३ )

जिंदगी तो जश्न है…

5 टिप्पणियाँ


खून का दरिया बहा है,

जिस्म भी बिखरा पड़ा है |

और पवन उन्मत्त अब भी,  झूम कर है गा रही

गंध ए बारूद की,  किसकी सुलग से आ रही

जल रहा है क्या यहाँ,  चूल्हों में कोई असलाह है ??

या कहीं खंजर ले हाथों में,  खड़ा सैलाब है  ??

कुछ कहो कुछ तो बताओ,
क्यूँ गली में शोर है ???

क्यूँ महकती वादियों में,

आ घुसा कोई चोर है ???

कल शहर की उस हवेली में,  मरा एक श्वान था

सुर्खियाँ बन के खबर, चर्चा वो शहर-ए-आम था

आज क्यारी लाल है,

चूड़ियाँ बेहाल हैं

बेटियों की अस्मतें, जब लुट रहीं हर चौक पर

क्यूँ खबर अखबार की,  भड़वा बनी है नोट पर ???

दूरदर्शन पर प्रदर्शन,

अधखुली  देहों के दर्शन

और मुहल्लों के घरों में, बस टपकती लार है

क्या बहन और नारियों की, जिंदगी बाजार है ???

पर अचानक उस गली में, कुछ नज़ारा और था

और समय की चाल पर, एक सभ्यता का जोर था

अधखुली नंगी धडें थीं

खोखली करती जडें थीं

और बदन की गर्मियां, शर्दी को करती नर्म थी

कौन कहता है की एक,  औरत का गहना शर्म थी

भूख से बच्चा बिलख कल, मर गया सुनसान में

बाप उसका ओढ़ बैठा, जिंदगी शमशान में

लोग कहते थे, गरीबी भुखमरी का जोर है

बदहवासी को समेटे, जिंदगी कमजोर है

पर यहीं गोदाम में, गेहूं की बोरी सड़ गयी

कागजों पर अन्न की, भण्डार क्षमता बढ़ गयी

भूख शायद झूठ है

बाग बनता ठूँठ है

और ए फितरत बागबाँ कि, दिल का दरवाजा खुला

ठूँठ के मधुबन पे देखो, हर खजाना लुट गया

शान्ति कि वार्ता, चलती रही महलों में ही

ध्वज लहरता है किले पर, साल में दो बार भी

कुछ करोड़ों का ए जलसा, शान मेरे हिंद कि

झूठ है सीमाओं पर बहता लहू, लुटती हुई हर जिंदगी

चार तांबे के वो तमगे, डाल कर उस भाल पर

कर अदा कीमत कफ़न की, है तमाचा गाल पर

खुश है हम तो क्या गिला है??

जैसे हम वैसा सिला है!!!

कौन कहता है यहाँ, चिंगारियां धधकी कभी

जिंदगी जब मौत से, हर पल यहाँ सस्ती लगी

हर तरफ बस प्रश्न है

प्रश्न भी कुछ नग्न है

क्या यही बस प्रश्न बन, बारूद सा कुछ जल रहा ???

और यूँ  ठंडी राख से, छंटता धुवाँ सा पल रहा ???

या सुलग निशक्त सी, बस गंध ले कर आ रही ??

जो अधूरी आपसे कुछ, पंक्तियाँ समझा रही

क्या पता कल कि सुबह कुछ,  फिर अँधेरी सी लगे

आपमें भी प्रश्न ऐसा,  कुछ अधिक बन कर जगे

तो सवालों कि ए बस्ती, कुछ अधिक गुलज़ार होगी

जिंदगी कुछ इन सवालों को,  लिए बेजार होगी

तो सवालातों के मंज़र, कुछ हंसी बन कर सजेंगे

मन में उठते हर भवंर बस,  धार बन कर न रहेगे

बस यही एक स्वप्न है

फिर जिंदगी तो जश्न है

जिंदगी तो जश्न है

उपेन्द्र दुबे(२३/०७/२०१२)

 

 

 

चाँद ..या..रोटी …

6 टिप्पणियाँ


दो रोटी कि निपट सफेदी, चाँद बाँध कर सोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

चाँद उतरता कहीं तवे पर

कहीं अमावस होता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

आँचल में सूखे दो स्तन,

मैला आँचल, मैला सा तन

सपनों के कुछ टूटे तारे

आँखों में बसते हैं सारे

सीवर कि पटियों के उपर

भारत भाग्य संजोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

एन पी टी कि धवल बोरियां

उजले मन को ढोती है

पिछवाड़े कि वही झोपडी

दिन होने को रोती है

कहीं रात रौशन ढिबरी से

कहीं भाग्य लिपटा कथरी से

रेशम पर पैबंद बना एक

टाट सांझ को खोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

खेतों में अब दरक पड़ गए

शाखों से पत्ते भी झड गए

मैदानों में सुखी घान्सें

बूदों को अटकी थी सांसें

ढोर, बैल,खेती खलिहानी,

चिल्लाते थे पानी पानी

सूरज कि गरमी झुलसाती

कुछ उधार कि लपट जलाती

पगड़ी बन फांसी का फंदा

जीवन कि लौ कर गयी मंदा

 

पर कल कि कुछ बात अलग थी

रातों में वो रात अलग थी

टिन के टप्पर पर टपटप हुई

आँगन में थोड़ी छप छप हुई

झमाझम बरसी तब बरखा

मन में पर कुछ अलग सा डर था

क्या ए भी सपना कोई सच था ????

कुछ किसान हँसते थे जाते

कुछ नैनों से नीर बहाते

काँधे पर अब हल तन गए थे

बैलों के बगने खुल गए थे

खेतों में माटी थी महकी

झोपड में जीवन थी बहकी

तवा कटोरा लोटा बल्टी

देते थे बूंदों को उलटी

नहीं फिकर थी चाँद चमक कि

रोटी कि फिर किसे गरज थी

बंधी पोटली आटे कि तब

उछल गिरी चन्दा के मुंह पर

दो हाथों कि फ़ैल देख लो

इन भूखों कि ठेल देख लो

नंगे पेटों का ए जलसा, भारत में ही होता है???

एक गली में नंगा बच्चा बिन रोटी के रोता है

दो रोटी कि निपट सफेदी चाँद बाँध कर सोता है

–उपेन्द्र दुबे(२१/०७/२०१२)

मैं अकेला…..

8 टिप्पणियाँ


मैं अकेला, पथ मुझे, ले चल समेटे धुल में

रह गए जो रहगुजर तक, क्या मज़ा है फूल में

कारवां जो साथ कल तक, था यही उस मोड पर

साथी थामे हाथ संग थे, जिंदगी के छोर तक

उस हंसी मौसम की मस्ती, दूर सोती है कहीं

उस घने जंगल की हस्ती, चूर होती है यहीं

आज पतझर फिर चढ़ी है, बावरी बन डाल पर

और पवन आँचल समेटे, सांवरी सी चाल पर

आज हलचल सी मची, हर ओर कुछ पुरजोर है

जैसे सावन की घटा में, हो छुपी कोई भोर है

रात ही थी एक काली, साथ अब तक दे रही

आज अब इस मोड पर, वह भी सिमटती खो रही

दिन भयानक रौशनी संग, दौड़ता सा आ रहा

हर परत तम का हटाता, तोड़ता सा जा रहा

फिर वही बदरंग चहरे, कलिखों की कोख पर

आँखों के आगे फिरेंगे, कातिलों की नोक पर

और कतल हल्दी का होगा, कुमकुमों के घाट पर

रोलियों की भाल फिर, चन्दन चढेगी हाट पर

 

अब नहीं पाथेय, पथ पर,

दौड़ता घनघोर रथ पर

काल का पहिया चला है

ध्यान का यौवन ढला है

कांपती वो उंगलियां अब

ढोती हैं भुजदंड बरबस

लपलपाती है सहेली

काटती जीवन पहेली

चल पकड़ कुछ दूर ले चल

इस गली से दूर हर पल

रात फिर कहीं ढल न जाये

ये दिवा एक पल न भाये

चल प्रवर बन कर समा ले

जिंदा हूँ जिंदा बुला ले

दौड़ती हर पल अकिंचन, कुछ तो है कहीं खो रहा

जिंदगी यूँ मौत की ,बाहें पकड़ कर रो रहा

 

सारथी बनता पतन अब, मन जूता बन अश्व है

वल्गा थामे क्रूरता अब, हंस चली सर्वत्र है

बादलों का एक कतरा, है पिघलता भूल में

बावरी मधुबन समझ बैठी, शरद को शूल में

 

मैं अकेला, पथ मुझे ले चल समेटे धुल में …..

मैं अकेला, पथ मुझे ले चल समेटे धुल में …..

 

–उपेन्द्र दुबे

(१५/०४/२०१२)

Older Entries