हरिया काका…

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पुराने शहर की, बड़ी याद आती है
अरसा गुजरा, कुछ यादें अब भी रुलाती हैं
कुछ बातें अब भी डोलती हैं
कुछ यादें बोलती हैं
याद आता है वहीँ का, एक वाकया

जिसमे सबकुछ लगभग, हरेक जीवन में घटा

 

मेरे मोहल्ले में ही, हरिया काका का परिवार रहता था
सांझ चूल्हे में आग नहीं तो, कभी मटके से पानी बहता था
चार बेटे, बूढ़े माँ बाप, काका और काकी
सब हिल मिल रहते बने एक दूजे के साथी
गरीबी थी, पर संतोष भी था
जीवन से लड़ने का माद्दा, और जीने का जोश भी था
धीरे धीरे बच्चे बढे
शादियाँ हुई, झगड़े बढ़े
मकान कमरों में बंट गया
आँगन दीवारों से अंट गया
अब चार दरवाजे अलग अलग निकसारी
काका काकी रहने लगे चार कमरों में बारी बारी
आँगन के एक कोने से किसी बच्चे की गेंद, दुसरे कोने में नहीं जाती थी
और अगर चली गयी तो कोने वाली चिल्लाती थी
पर चार कोने के बच्चे कहाँ रुकते थे
लुक छिप के एक दूजे से मिलते थे
पर धीरे धीरे उन कोने वालियों ने बच्चों में भी, द्वेष का जहर भरा
अब तो बच्चों में भी तकरार बढा
न जाने आगे क्या हुआ, मैं दूर हूँ
पर एक तुलनात्मक विश्लेषण करने को आज मजबूर हूँ
एक घर, फिर चार कमरों में चार घर
घर धीरे धीरे होता बेघर
ठीक वैसे ही जैसे, महाराष्ट्र में बिहारी का होना खटकता है
अब धीरे धीरे बिहार और आसाम भी भटका है
अन्य राज्यों में भी कमोबेश यही हालचाल है
अपने देश का तो हरिया काका से भी बुरा हाल है
यहाँ भी हर कोने में कुछ कोनेवाले सिपहशलार है
जनता भी आँगन के बच्चों की तरह अनजानी बेपरवाह है
आजीविका की गेंद यहाँ भी एक कोने से दूसरे कोने में लोगों को ले आती है
कुछ बदले हुए ढंग से वो कोनेवालियाँ यहाँ भी चिल्लाती हैं
ये चिल्लाना अब तो दंगों का रूप भी लेता है
कई जानें जाती हैं पर मरने वाला, कोनेवालों का थोड़ी कोई बेटा  है
उनको तो बस कोनों की फिक्र है
अख़बारों की शुर्खियों में थोड़ी बहुत जिक्र है
आये दिन ये घटनाएं और हुडदंग होते हैं

परन्तु यहाँ के काका और काकी तो लगभग हमेशा सोते हैं
शायद यही यहाँ के काका काकी के नेतृत्व का आधार है
और बच्चो का भी मूल मुद्दों से कहाँ कोई सरोकार है
रोज नए कोनेवाले पैदा होते हैं
नए नए कोने खोजते हैं
कभी राज्य और क्षेत्र के नाम पर
तो कभी हिन्दू मुस्लिम के नाम पर
भाषा और संस्कृति भी बांटी जाती है
पर बच्चा बनी यह जनता नहीं समझ पाती है
दंगों में मारे गए लोगों का, धर्मों के आधार पर आदर सम्मान होता है
पीड़ा तो दूर कारण भी अनजान होता है
यहाँ के हरिया काका कभी कभी इतना पगलाते हैं
की दंगाइयों को ही शहीद बताते हैं
रख दिए जाते हैं सारे कारण ताक  पर
क्यूंकि अपनी कुर्सी भारी नजर आती है हर बात पर
काश की हरिया काका की तरह यहाँ के मुखिया भी समझ पाते
की शराबी कल्लू की नजर रहती है घर की शांति पर आते जाते
उसकी वो नजर व्यभिचार का दर्पण है
जिस पर सबकुछ आज इनका अर्पण है
आज कल्लू और उसके साथियों के महिमामंडन में घर के कुलवधू शांति का सौदा करने लगे हैं
हरिया काका ८६ की उम्र में भी बहकने लगे हैं
चश्मे के उस पार से उनको ये नजर नहीं आता है
कि  यही कल्लू ,काकी को भी भौजाई बुलाता है
स्वार्थ के अंधे आज अपने ही घर के लोगों को कटघरे में खड़ा करने को अमादा है
क्यूंकि कल्लू के गुर्गों को खुश करना उनको जरूरी ज्यादा है
कल्लू की लाठी और अपने स्वार्थ का दंभ काका की कुर्शी की पहरेदारी है
शायद लोग बच्चे हैं उनकी समझदारी से कहाँ यारी है
पर अगर ये बच्चे बड़े हुए
कल को खड़े हुए
तो काका की पतलून तक न बचेगी
दाढ़ी चस्मा दूर पड़ा होगा
पगड़ी गर्दन पर अड़ेगी
मन को मोहते मनमोहन का रूप हमेशा पूजनीय नहीं होता
वक़्त किसी का हमेशा दयनीय नहीं होता
ठण्ड कितनी भी हो घर जला कर कोई हाथ नहीं सेकता
दीवारों को तोड़ कोई घर की इज्ज़त भेदियों के बीच नहीं फेंकता
आज वो शहर छूटा, छूट गया हरिया काका का वो परिवार

पर देखता हूँ की हर शहर में वो एक शहर है, और घर में कुछ ऐसा ही मच है हाहाकार

ध्रितराष्ट्र के पुत्रमोह ने एक महाभारत को जन्म दिया था

उसके अन्धत्व ने सारी इंसानियत को झकझोर दिया था

यही वो भारत है, और काल भी शायद सबकुछ दोहराता है

कुछ कुछ आज भी वैसा ही नजर आता है

आतंकवादी शहीद करार दिया जाता है

देश तुला पर एक अंधे स्वार्थ को तोल  रही है

हर तरफ शायद निराशा बोल रही है

पर जो भी हो वो शहर मुझे अब भी याद आता है

जैसा भी हो उस शहर से एक नाता है

 

–उपेन्द्र दुबे(०६/०७/२०१३)

कैसी वो थी रात…..

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कहीं दूर एक पल को, धडकन थमी थी |

कहीं रात सूरज की, किरणें जगीं थी | |

कहीं दूर चिड़ियों ने, छोड़ा बसेरा |

अंधेरों की चादर में, लिपटा  सबेरा | |

 

कहीं रात मद्धम सा, झोंका हवा का |

नयन छेड़ हौले से, खोला झरोखा | |

कहीं रात आँगन में, रुनझुन नुपुर की |

वो चुपके से आँचल थी, छू गयी किसी की | |

 

किसी की नरम सी, हथेली सी थी वो |

उसी पल को आई, सहेली सी थी वो | |

गुम थी ख्यालों में, वो खुशनुमा सी |

मीठी कहानी हो, जैसे सुनाती | |

 

कहीं रात निन्दियों ने, लोरी सुनाई |

नन्हे सुबह को, थपक कर जगाई | |

अंधेरों की गुनगुन थी, चांदी सी रातें |

बनी ख्वाब मन में, संजोने को बातें | |

 

कैसी वो थी रात, दिन को जगा गयी |

किसकी वो थी बात, सपने सजा गयी | |

चलो जिंदगी को, सबेरा बना लें |

उसी रात में अपनी, दुनिया बसा लें | |

मिले जिस डगर पर, सुबह सांझ तुमसे |

चलो उस डगर पर , घरोंदा सजा ले | |