गुजारिश …

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कहीं है आग का दरिया,

कहीं शोलों कि बारिश है

समंदर कि तपिश समझों,

ये मौजों कि गुजारिश है

घने बादल बरसते हैं

कहीं पर दिल तरसते हैं

कहीं मदहोशियों कि कुछ अदायें याद आती हैं

कहीं सरगोशियाँ छुप के, वफाओं को हंसाती  हैं

कहीं पैगाम आँखों से, दिलों को चीर कर खोती

कहीं धड़कन कि दस्तक पर, जवानी रात भर रोती

छलक जब जाम है चढ़ती, सुहानी बंद गलियों में

कसम से आग लग जाती, यहाँ कमसिन कलियों में

जरा उस आग से कह दो, यहाँ मौसम कि साजिश है

समंदर कि तपिश समझों, ये मौजों कि गुजारिश है

यहाँ  बातों के रेलों से,

शहर वीरान सजते हैं

तबेले ज़िंदगी के जब ,

झमेलों से गुजरते हैं

शहर कि सुन्न गलियों में,

मकां  पैगाम देता है

खुली छत के झरोखों से,

ये मंजर आम होता है

शिफा-ए -मौत से कुछ ज़िंदगी करती सिफारिश है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है

अभी वीरानियों पे कुछ,

दीवारें दर्प करती थीं

कफ़न ढांचों पे लिपटा कर,

बदन को गर्म करती थीं

सिहर कर चांदनी, मजमूनियत पर मुस्कराती थी

शहर शमशान में सोते हुए एक गीत गाती  थी

रवानी ज़िंदगी की, हर कदम गुलशन सजाती है

मुहब्बत झील सी, बस हर तरफ किस्सा सुनाती है

उसी गुलशन कि अर्ज़ी से, फलक लिखता तवारीख है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौसम कि गुजारिश है

 

धधकता कुछ दबा सा आज, सीने में दहकता है

ढली हुई साँझ के उस छोर पर, सूरज चमकता है

सितारे टूट कर आँगन में, अब भी रोज गिरते हैं

कसक छोटे से दामन कि, फलक तक साथ फिरते हैं

मगर रुशवाईयां ही हर कदम, गुलजार होती है

उजड़ कर आज ये बस्ती, शरम से तार होती है

उसी बस्ती कि सरहद पर, सबेरा छुप के रोता है

अँधेरा आज गलियों में दुबक कर खूब सोता है

सुबकती हर तरफ बस आज अरमानों कि डोली है

कहीं माथे चढ़ी है राख, बस करती ठिठोली है

सजी इस आरती में बदनसीबी, एक अदा सी है

समंदर कि तपिश समझो, ये मौजों कि गुजारिश है

 

–उपेन्द्र दुबे(०१/०२/२०१४)

चाँद ..या..रोटी …

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दो रोटी कि निपट सफेदी, चाँद बाँध कर सोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

चाँद उतरता कहीं तवे पर

कहीं अमावस होता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

आँचल में सूखे दो स्तन,

मैला आँचल, मैला सा तन

सपनों के कुछ टूटे तारे

आँखों में बसते हैं सारे

सीवर कि पटियों के उपर

भारत भाग्य संजोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

एन पी टी कि धवल बोरियां

उजले मन को ढोती है

पिछवाड़े कि वही झोपडी

दिन होने को रोती है

कहीं रात रौशन ढिबरी से

कहीं भाग्य लिपटा कथरी से

रेशम पर पैबंद बना एक

टाट सांझ को खोता है

एक गली में नंगा बच्चा, उस रोटी को रोता है

 

खेतों में अब दरक पड़ गए

शाखों से पत्ते भी झड गए

मैदानों में सुखी घान्सें

बूदों को अटकी थी सांसें

ढोर, बैल,खेती खलिहानी,

चिल्लाते थे पानी पानी

सूरज कि गरमी झुलसाती

कुछ उधार कि लपट जलाती

पगड़ी बन फांसी का फंदा

जीवन कि लौ कर गयी मंदा

 

पर कल कि कुछ बात अलग थी

रातों में वो रात अलग थी

टिन के टप्पर पर टपटप हुई

आँगन में थोड़ी छप छप हुई

झमाझम बरसी तब बरखा

मन में पर कुछ अलग सा डर था

क्या ए भी सपना कोई सच था ????

कुछ किसान हँसते थे जाते

कुछ नैनों से नीर बहाते

काँधे पर अब हल तन गए थे

बैलों के बगने खुल गए थे

खेतों में माटी थी महकी

झोपड में जीवन थी बहकी

तवा कटोरा लोटा बल्टी

देते थे बूंदों को उलटी

नहीं फिकर थी चाँद चमक कि

रोटी कि फिर किसे गरज थी

बंधी पोटली आटे कि तब

उछल गिरी चन्दा के मुंह पर

दो हाथों कि फ़ैल देख लो

इन भूखों कि ठेल देख लो

नंगे पेटों का ए जलसा, भारत में ही होता है???

एक गली में नंगा बच्चा बिन रोटी के रोता है

दो रोटी कि निपट सफेदी चाँद बाँध कर सोता है

–उपेन्द्र दुबे(२१/०७/२०१२)

टीटही और चकोर…

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कल भी नभ पर तारों का झुण्ड,

छिपमछिपाई खेल रहा था |

आसमान से दूर ओट में,

चंदा गुमशुम झेल रहा था | |

अलसाई कुछ पस्त पवन थी |

तन्हाई कुछ मस्त मगन थी | |

पग बोझिल, गरमी के दिन थे |

नैनों में कुछ आंसू कम थे | |

 

कदम सीढियों से जीने के |

छत पर थे बरबस जा पहुंचे | |

 

तब टीटही  चकोर से बोली |

सुन सुनाऊँ तुझको हमजोली | |

 

तू ये जो टकटकी लगाये, चंदा की है बाट जोहता |

क्या है ऐसा उस टुकड़े में, जो तेरा यूँ मन है मोहता ???

कुछ दिन में सावन बरसेगा |

तन मन और यौवन हरसेगा | |

मादकता मेघों में घुलकर, वसुधा का मनुहार भरेगी |

कुछ बच कर नभ के टुकड़ों में, चंदा का श्रींगार करेगी | |

धवल प्रियतमा के आँचल में, दुबक तुझे फिर नहीं तकेगा |

तू यूँ ही चितवन संग पगले, विरह प्रीत क्या ऐसे सहेगा ???

सच कहती हूँ….

 

मैं गाऊंगी तू निहारना |

चंदा को तू छोड़ ताकना | |

खुशियों की डफली ठोकेंगे |

नहिं कभी ऐसे रूठेंगे | |

 

तब चकोर ने नज़र घुमाई |

मंद मंद पहले मुस्काई | |

रे टीटही …

रे टीटही तू ना समझेगी |

ज्वार अगन की क्या परखेगी ??

सावन जो तू नाप रही है, नम समीर की बोझलता से |

नैनों के आंसू घुल गए हैं, बरसेंगे कल समरसता से | |

प्रीत देह की नहीं रे टीटही , जीवन का रसरंग छुपा है |

मधुबन के आँगन में रहती, क्या उसमे ही स्वर्ग बसा है ??

 

सुन बतिया मेरा मन डोला |

धीरे से मुझसे फिर बोला | |

यूँ मुट्ठी में रेत बांध

क्यूँ नाहक परेशान किया है ??

यूँ घुट के छत पर चलने से |

क्या जीवन वरदान हुआ है ????

सच कहती हूँ , चल चलते हैं …

 

चल चिड़ियों के पंख पकड़ हम, दूर गगन तक हो कर आयें |

चल तितली का रंग ओढ़ हम, फूलों में कुछ यूँ छुप जायें | |

इन्द्रधनुष के सात रंग में ,

हम अपनी खुशियाँ ढूँढेंगे |

तू कुछ रंग जेब में भरना, मैं कुछ से मुट्ठी भर लूँगा |

कुछ फिर भी बाकि गर बच गए ,

दोनों ओढ़ साथ चल देंगे | |

रात चढेगी वहाँ सांझ जब,

हम दोनों तारे तोड़ेंगे |

चंदा संग बदरी में छुपकर,

खूब देर तक हम खेलेंगे | |

गर तुझको जो ठण्ड लगेगी, बादल के फाहे ओढेंगे |

रात वहीँ रुक हम दोनों फिर, कहीं गगन में छुप सो लेंगे | |

सुबह सूर्य की कुछ किरणें ले |

फिर हम वापस घर लौटेंगे | |

घर रौशन होगा तारों से,

दीवारें किरणों से होंगी |

फिर टीटही  चकोर की बोली,

नहीं सुनेंगे हम हमजोली | |

फिर टीटही चकोर की बोली, नहीं सुनेंगे हम हमजोली ….

–उपेन्द्र दुबे (०५-०४-२०१२)

नवल धवल मंगलमय अर्पण …..

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कल मेरे आँगन में पूरा,

चाँद अचानक आया था |

तारों के उस बड़े झुण्ड पर,

थोड़ा सा इठलाया था | |

मैंने कान पकड़ ली उसकी,

सोचा तुम्हे दिखाऊँगा |

पर देखो न आधा ही है,

कैसे तुम्हे रिझाऊंगा | |

कल तक बड़ा सलोना ही था,

चांदी सी ही चमक भी थी |

राह तुम्हारे चलते चलते,

कुछ मलिन सा लगा मुझे

मैंने नदी राह में देखि,

सोचा इसे यहीं धो लूँ !

ठंडी ठंडी रात भी थी , और ठंडा नदी का पानी था |

लगा कांपने छूते ही जल

मैंने सोचा धो लूँगा

पर वो धार नदी की सहसा,
तेज हुई ही जाती थी |

भागा जाता चाँद उसी पर ,

देख हुई हैरानी थी | |

झपट पकड़ मैंने उसको फिर ,

लोटे में नदी धार भरी ,

आधी धार उड़ेली उस पर ,

रगड़ रगड़ धोया मैंने ,

कुछ खँरोच भी आई मुख पर ,

जिसका दाग अभी तक है |

 

फिर पोंछा कुर्ते से अपने |

नन्हा चाँद भी लगा था हँसने  | |

चांदी सी उस नवल भोर का ,

बना लिफाफा खुद से ही ,

भरा चाँद के टुकड़े को और,

तारों की कुछ चमक भरी |

चलने लगा डगर पर अपने

झोले को काँधे पर रख

सच कहता हूँ पूस मांह की

सर्दी बड़ी निराली है

हाड़ कंपाती पुरवाई थी

पर लगती मतवाली है

रात स्याह की डगर खतम हुई

अब पहुंचा हूँ तुम तक मैं

नन्हा रवि भी झाँक रहा था

गगन स्वर्ण की खिडकी से

खोल लिफाफा बंद भोर का

चाँद हाथ में थाम लिया

पर आँखों में आंसू आ गये

देख उसे आभा विहीन

धुले हुए इस चाँद से अच्छा

भला था मेरा वो मलीन

हो रुआंस उस बाल सूर्य से

मुट्ठी भर किरणें मांगी

उस उधार की किरण मली

मैंने उस चंद के मुखड़े को

तब देता हूँ भेंट मैं तुमको

उसी चाँद के टुकड़े को

मधुबन में कोयल थी कूकी

आधी कुक मैं भर लाया

सोचा संग चाँद के दूंगा

पता नहीं तुमको भाया

मुझे पता है नहीं भायगा ,

धूसर सा भौंडा मुखडा

पर क्या करता नवल गगन में

मुझे मिला बस ये टुकड़ा

हर आगंतुक वर्ष चमक को

गया वर्ष सब खोता है

नए चाँद की हंसी को देखो

यही चाँद तो रोता है

उसी चमक का एक अंश

तुमको ये अर्पण करता है

नवजीवन को आज तुम्हारे

खुद का तर्पण करता है

अब छोडो अट्टी कट्टी

उठो आज अब मुंह धो लो

देखो नया ब्रह्मतल सारा

स्वागत को अकुलाया है

चलो चाँद को रौशन कर दे

नया वर्ष अब आया है

 

–उपेन्द्र दुबे(३१/१२/२०११)

अंबिकापुर से ….