संवेदनहीन पटकथा …

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लुटी सी आबरू का तकाजा
जिन्दा अरमानों का जनाजा
मुस्कराता निष्ठुर राजा
भांडों का बैंड बाजा
कुछ काल की लचक थी
सांसें अटकी सी वो हलक थी
आंसुओं का मोल था
जीवन शायद झोल था
तभी तो बादलों का फटना, आंसुओं की बाढ़ ले आया था
कल तक जहाँ घण्टे बजते थे, आज मुर्दों का साया था

बेचारगी कुछ कुछ ठुमकती थी
बेहया बड़ी बेरहमी से हंसती थी
खींसे निपोरते चंद लोग
बाकी पिलते हुए संजोग
घढ़ियाली आंसुओं का रिवाज था
बेजान बदन से उतारा जाता लिबास था
नाटक और सच का रंगमंच है
शायद दुनिया ही प्रपंच है
तभी तो लाशों के टुकड़े काटे जाते थे
और एहसानों की दरियादिली ऐसी की अख़बारों में इश्तहार छप के आते थे

कसाई भी शुतक का शोक मनाता है
हंसी ख़ुशी और आडम्बर से लोक लजाता है
डायन भी सात घर छोडती है
अपने घर के सदस्यों को जोडती है
लोमड़ी, शियार, कुत्ते इन सब की भी एक मर्यादा है
कर कुटुंब की मौत पर बहते इनके भी आंसू ज्यादा है
परन्तु इन सब से ऊपर मैं इंसान हूँ
ऐसी दकियानुशी बातों से परेशान हूँ
तभी तो बर्बादी का बाज़ार सजाता हूँ
और उसकी एक दूकान पर मंगल गीत गाता  हूँ

चिता की आंच पर रोटी सेकने का ये चलन
मुर्दों की ठण्ड से बुझते हवस की जलन
कुछ की दबी हुई हंसी
कुछ की जान है फंसी
कुछ जीवन दान में समर्पित है
कुछ उन पर अपनी दूकान में अर्पित हैं
अजब सा चलचित्र है
जिसमे सबकुछ विचित्र है
शोक शंतप्त मैं भी हूँ कैसे कहूं
क्यूंकि दिनचर्या वही है, वहीँ मैं भी हूँ
पर शायद देख रहा हूँ इस चलचित्र को पिछले कुछ दिनों से
तभी तो भावशून्य सा लगता है सबकुछ बिना इन नगिनों के
तीन तरह के नायकजिनकी नियति ने इस चलचित्र को अमर किया
मृत, जीवित, और जिजीविषा के यज्ञ में जिसने आहुति दिया
जाने कब तलक याद आयेंगे
या ये भी और चीज़ों की तरह यूँ ही भुला दिए जायेंगे

उपेन्द्र दुबे(२७/०६/२०१३ )

बोलो न …

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कल तुमने कहा था मुझसे बात न करना

आज कहती हो गली से न गुजरना

कल कहोगी सपनो में मुखबिरी क्यूँ करते हो

लोगों के सामने मेरी किरकिरी क्यूँ करते हो

कुछ दिन पहले ही तो कहा था न ….कि

“गलियों की धुल सरगोशियाँ करती हैं मेरे कानों में

तुम्हारे चुप रहने का नाटक, खामोशियाँ करती है दुकानों में”

तुमने कहा मेरी प्रीत चुभती है

आँखों में मेरी  बेवफाई दिखती है

और भी न जाने वो कौन से अलफ़ाज़ थे

बुरे स्वप्न थे या तुम्हारे जीने के अंदाज़ थे

मैं सुनता रहा

अपनी ही धुन बुनता रहा

सोचता था ए आज की बात है

कल नया होगा बस थोड़ी और रात है

उम्मीद थी की तुम समझोगी

आज नहीं ,शायद कल कुछ कहोगी

पर न तुम बदली, न मैं बदला

पलों का कारवां पहला

उनके उड़ते गुबार में मुझे ही खोना था

तुम्हे तो बस किसी और की होना था

पर शायद अंदाज़ा नहीं था

जख्म गहरा था, पर ताजा नहीं था

आज सांझ नदी के उसी तट पर तुम्हारा आना

मेरे कंधे को धीरे से थपथपाना

मेरी नज़रों का तुम पे फिर से गिरना

और मेरे हाथों का तुमसे मिलना

सोचा सब बदल गया

पर ए गुमान भी जैसे छल गया

कागज के वो टुकड़े जिसे मैंने खत समझा था

तुम्हारी मुट्ठी में छटपटा रहे थे

जैसे छूटने  से पहले कुछ कसमसा रहे थे

कितना सपाट कहा था तुमने …ए टुकड़े मुझे बोझ लगते हैं

इन्हें संभालो मुझे खुदगर्ज़ लगते हैं

कहाँ उठ पाए थे मेरे हाथ उन्हें थामने को

तभी तो तुमने फेंका था उन्हें नदी  में….और चल दी थी कभी न आने को

मैं पथराया देखता चला गया था  उनका बहना

नहीं रोका था तुमको भी मैंने …है ना !!!

पर पता है ….

उस दिन कागज के टुकड़े वो तैरेते जाते थे, डूबे नहीं थे

उछलते कूदते बहुत दूर तक भागे थे, ओझल होंने तक रुके नहीं थे

नदी ने भी उन्हें अपने किनारों पर छोड़ा नहीं था

भर लिया था अपने अंक में , ऐसे तो मुंह मोड़ा नहीं था

सच कहता हूँ वो डूबे नहीं थे …तैरे थे बहुत दूर तक

बोलो न फिर कैसे बोझ थे वो ….

बोलो न …..कैसे बोझ थे वो

बोलो न …..

–उपेन्द्र दुबे (२५/०५/२०१२)

मैं अकेला…..

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मैं अकेला, पथ मुझे, ले चल समेटे धुल में

रह गए जो रहगुजर तक, क्या मज़ा है फूल में

कारवां जो साथ कल तक, था यही उस मोड पर

साथी थामे हाथ संग थे, जिंदगी के छोर तक

उस हंसी मौसम की मस्ती, दूर सोती है कहीं

उस घने जंगल की हस्ती, चूर होती है यहीं

आज पतझर फिर चढ़ी है, बावरी बन डाल पर

और पवन आँचल समेटे, सांवरी सी चाल पर

आज हलचल सी मची, हर ओर कुछ पुरजोर है

जैसे सावन की घटा में, हो छुपी कोई भोर है

रात ही थी एक काली, साथ अब तक दे रही

आज अब इस मोड पर, वह भी सिमटती खो रही

दिन भयानक रौशनी संग, दौड़ता सा आ रहा

हर परत तम का हटाता, तोड़ता सा जा रहा

फिर वही बदरंग चहरे, कलिखों की कोख पर

आँखों के आगे फिरेंगे, कातिलों की नोक पर

और कतल हल्दी का होगा, कुमकुमों के घाट पर

रोलियों की भाल फिर, चन्दन चढेगी हाट पर

 

अब नहीं पाथेय, पथ पर,

दौड़ता घनघोर रथ पर

काल का पहिया चला है

ध्यान का यौवन ढला है

कांपती वो उंगलियां अब

ढोती हैं भुजदंड बरबस

लपलपाती है सहेली

काटती जीवन पहेली

चल पकड़ कुछ दूर ले चल

इस गली से दूर हर पल

रात फिर कहीं ढल न जाये

ये दिवा एक पल न भाये

चल प्रवर बन कर समा ले

जिंदा हूँ जिंदा बुला ले

दौड़ती हर पल अकिंचन, कुछ तो है कहीं खो रहा

जिंदगी यूँ मौत की ,बाहें पकड़ कर रो रहा

 

सारथी बनता पतन अब, मन जूता बन अश्व है

वल्गा थामे क्रूरता अब, हंस चली सर्वत्र है

बादलों का एक कतरा, है पिघलता भूल में

बावरी मधुबन समझ बैठी, शरद को शूल में

 

मैं अकेला, पथ मुझे ले चल समेटे धुल में …..

मैं अकेला, पथ मुझे ले चल समेटे धुल में …..

 

–उपेन्द्र दुबे

(१५/०४/२०१२)

कैसी वो थी रात…..

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कहीं दूर एक पल को, धडकन थमी थी |

कहीं रात सूरज की, किरणें जगीं थी | |

कहीं दूर चिड़ियों ने, छोड़ा बसेरा |

अंधेरों की चादर में, लिपटा  सबेरा | |

 

कहीं रात मद्धम सा, झोंका हवा का |

नयन छेड़ हौले से, खोला झरोखा | |

कहीं रात आँगन में, रुनझुन नुपुर की |

वो चुपके से आँचल थी, छू गयी किसी की | |

 

किसी की नरम सी, हथेली सी थी वो |

उसी पल को आई, सहेली सी थी वो | |

गुम थी ख्यालों में, वो खुशनुमा सी |

मीठी कहानी हो, जैसे सुनाती | |

 

कहीं रात निन्दियों ने, लोरी सुनाई |

नन्हे सुबह को, थपक कर जगाई | |

अंधेरों की गुनगुन थी, चांदी सी रातें |

बनी ख्वाब मन में, संजोने को बातें | |

 

कैसी वो थी रात, दिन को जगा गयी |

किसकी वो थी बात, सपने सजा गयी | |

चलो जिंदगी को, सबेरा बना लें |

उसी रात में अपनी, दुनिया बसा लें | |

मिले जिस डगर पर, सुबह सांझ तुमसे |

चलो उस डगर पर , घरोंदा सजा ले | |

 

एकाकी , तुम मेरे साथी…

4 टिप्पणियाँ


एकाकी , तुम मेरे साथी,

बस यूँ ही बन कर रहना |

चलूँ छोड़ जब अपनी माटी,

हाथ पकड़ कर तुम चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

धागे जब विश्वास के टूटे,

आँगन  जब अधिकार के छूटे |

नाते जब बेमाने से हों,

अपने भी बेगाने से हों | |

मन की कोर पकड़ पगली सी,

कण कण में मेरे बसना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

अवरोहों का जाल बिछा हो,

जीवन पथ विकराल बना हो |

भाग्य सूर्य पर ग्रहण पड़े जब,

सखियाँ मेरी रूठ गयीं सब | |

पथराती  भी नेह अगर हो,

थकी देह और रुकी डगर हो |

लिए हाथ आशा का दीपक,

राह दिखाते संग चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

चलूँ छोड़ जग का कोलाहल,

पी कर जब सारा हालाहल |

मधुबन जब वीरान बना हो ,

घर में भी शमशान बसा हो | |

राहों की जब धुल छिटक, माथे की तिलक बने निखरे |

पावनता जब ह्रदय गर्भ से, होकर के नीचे बिखरे | |

मेरा ‘मैं’ मुझसे छूटे जब, कुटिल दर्भ आलापों पर |

जीवन की संगिनी रूठे जब, झूठे व्यर्थ प्रलापों पर | |

तब जीवन की परिभाषा बन, उस प्रयाण तक तुम चलना |

एकाकी तुम मेरे साथी …बस यूँ हि बन कर रहना …..

–उपेन्द्र दुबे