एक धरती, दो भाग
एक में पानी, दूजे में आग
ज़मीन के टुकड़े बंटे,
उनमे एक मेरा देश
हजारों जाती, अनेकों भेश
करोड़ों लोग, करोडो मन, अनेक तन
पर कहलाते सभी जन
जन का जनाधार
बनाता है सरकार
उसमे एक राजा, सैकड़ों मंत्री
खाली खजाना, लाखों संतरी
करों का अध्यारोपण दिन पर दिन होता है
रजा रजाई में, और मंत्री उड़न खटोले पर सोता है
गरीबी है, भुखमरी है
आज का ये अंदाज़, नया है
कहीं होठों तो कहीं आखों से बयां है
अमीरी गाती है, गरीबों को हंसाती है
सबकुछ दीखता है
पर अपने बाप का क्या बिकता है
आधार गायब, जनता अजायब
अब तो यहाँ जन ही जन को धोता है
अबे, कहाँ कौन किसके लिए रोता है
बस दो दिन का मंचन
फिर दृश्य बदला, वही तन दूजे नयन
बुक और फेस का संयोजन
सिमट रहे कई योजन
अब तो देश का खाका वहीँ खींचता है
दूकान का क्या कहें दोस्त, वहां तो खरीददार भी बिकता है
प्रेम उल्लास इसी, बुक का स्टेटस अपडेट है
फेस चिपका है, बोली लगाओ, पूछो कितना रेट है
नया ज़माना, नए लोग, नयी पसंद
कहीं पर तुलसी, कहीं मकरंद
केसर की खुशबू कहीं खेतों से आती है
तो कहीं बंदूकों की सुलग धमकाती है
दोनों पडोसी फिर भी भाई हैं
क्या फरक पड़ता है
एक बकरा, दूसरा कसाई है
कभी कभी तो बाड़े पर ही गर्दन कटती है
पर फिर भी ईद की मिठाई, बड़े मजे से बंटती है
आतंकवाद रंगों में बंटता है,
कहीं भगवा तो कहीं हरा सफ़ेद दीखता है
टोपी और साफे का मिलन हर समारोह में होता है
एक के हाथों में खंजर दूजे की पीठ पर सोता है
मेज पर राजा नवाब तक़रीबन हर रोज मिलते है
साला, दावतों पर लाखों पीलते हैं
पान की पीक में दबी कमीनगी,कभी कभी भडवे का अकल भी लेती है
पर शांतिकाल साली, युद्ध का शकल कभी नहीं लेती है
शांतिप्रिय ज़मीन का ये टुकड़ा, मेरा भारत देश है
क्यूंकि यहाँ की अनोखी शांति, जीवन का सन्देश है
ये और बात है कि ,हर गली में शांति टुकड़ों में बंटती है
कहीं कहीं घरों के पीछे, लाल रंग में दिखती है
आये दिन इस शांति का चिर हरण होता है
सड़कों पर नंगी होती कभी सीता, तो कभी मनमोहन रोता है
शांति का बलात्कार भी होता है, अमूमन हर दिन हर शहर में
मोमबत्तियों की शकल में चीत्कार भी होता है, हर दिल हर नज़र में
पर फिर भी जनतंत्र है
गण का अधिकार, यह महामंत्र है
भूखे लोग सोडा पीते है
क्रिकेट के चौकों पर एक पल को जीते हैं
उन पलों का हिसाब मुट्ठी भर लोगों के जेबों में गिरता है
क्यूंकि मेरे दोस्त यहाँ सबकुछ बिकता है
कुछ दिनों बाद आनेवाले शनिवार को एक पर्व फिर मनेगा
गणतंत्र के नाम पर फिर से सर्व लूटेगा
यह वर्ग ही सर्वहारा है
तभी तो हँसता, हँसता, हर कोई बेचारा है
नंगे लोग शामियानों में सजेंगे
ढोल नगाड़ों के बीच जलसे मनेंगे
फलक पर करतब भी अजब होगा
पर कौन जाने क्या गज़ब होगा
शीशों की आड़ में शांति के रखवाले
सपनों का सौदा कागजों पर करेंगे
स्याही का रंग लाल और सफ़ेद कफ़न ध्वजों पर सजेंगे
कफ़न के वो दलाल बिरयानी का मज़ा भी कुछ साल लेंगे
फिर एक दिन चुपके से अख़बारों में चल देंगे
फाँसी की दलाली अपने हद तक चढ़ेगी
तभी तो देश में फिर से नयी शांति बढ़ेगी
अमन की इस दूकान में कुछ बलात्कारी पकवान कडवे होंगे
कुछ दिनों तक फिर आन्दोलनों की होड़ में थोड़े झगडे होंगे
फिर एक आई पि एल का सीजन आएगा
छोटे स्कर्ट में सब छिप जायेगा
आधार का एक कार्ड भी बनने लगा है
क्यूंकि दारू में रंगे मुर्गों का दन्भ कम्बल में ढलने लगा है
ये ऐसा ही चलेगा
तभी तो देश में शांतिपर्व मनेगा
प्रेषित अग्रिम बधाई आपको भी करता हूँ
वीचलित हंसी के साथ हर्षित आपका ये गणतंत्र कहता हूँ
ठंडी साँसों में भी एक गरमाहट हो
प्रार्थना के साथ मुर्दों के बिच भी थोड़ी आहट हो
क्यूंकि छाती माँ की ही फटती है
चूड़ियाँ विधवावों के हाथों में कहाँ सजती है
पायलों की छनक गोलियों में गुम हुई जाती हैं
फिर भी साल में दो बार ये पर्व मनाई जाती है
मैं आपका ये गणतंत्र हर्षित करता हूँ
और भारत का ये स्वतंत्र आपको समर्पित करता हूँ
भारत का ये स्वतंत्र आपको समर्पित करता हूँ
–उपेन्द्र दुबे
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