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मटमैली बारिश की बातें…

परियों की उलझी आँखों में, उलझा कल कुछ दूर चला |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

बूदों की टप टप सड़कों पर |

छत मुंडेर और गली घरों पर | |

उछल कूद काले मेघों की |

बरखा थी थोडा शरमाती  | |

डालों पे पत्ते हिलते थे |

पुष्प नहाने को खिलते थे | |

गरज लगी ढोलों की थपथप |

खिंच रही चितवन थी बरबस | |

बूदों में शरगम बनते थे |

गलियों में उपवन खिलते थे | |

क़दमों की छपछप में खो मन, मतवाला कल डूब चला |

मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

बूंदों ने संधि थी कर लीं |

बनी धार बंदी बन भर लीं | |

नालों में उफान तब आई |

दीवारें थोडा सकुचाई | |

सोचा बाँध नहीं पाऊँगी |

आज भला कैसे गाऊंगी | |

चला कारवां बूंदों का फिर, गति अनंत एक तड़प लिए |

मिलने को सरिता भी व्याकुल प्रेम पाश की फडक लिए | |

व्याकुलता संगीत बनी तब लय जीवन का भरती थी |

सच कहता हूँ प्रणव चाल कुछ मय जैसी ही लगती थी | |

दीवारें थामे थीं सबको, प्रेम अंश उन्माद लिए  |

एक बूँद भी बिछड न जाये, यत्न यही संवाद दिए | |

 

प्रीत पनपती देख दिलों में, रीत जगत निर्मूल खड़ा  |

मटमैली बारिश की बातें शायद मैं कुछ भूल चला  | |

 

और सुनो तुमको बतलाऊँ ……

 

कुछ बातें जो छूट रहीं थीं |

उस पल का रस लूट रही थीं | |

उनके शब्द शब्द कहता हूँ  |

भावों का विनोद कहता हूँ  | |

कुछ बूँदें जो टूट रहीं थीं |

पंखों से जो छूट रहीं थीं | |

घुल समीर की मंद छुवन में, यत्र तत्र सर्वत्र चलीं थीं |

उस बयार की मादक मधु ने, जीवन का सन्दर्भ चुनी थीं | |

 

भीगा था मन, तन भीगा था |

सारा जग, जीवन भीगा था | |

यौवन की गर्माहट भीगी |

जीने की आहट भी भीगी | |

नगर द्वार नर नारी भीगे |

मन दर्पण खुद वारी भीगे | |

मस्त मधुर संसर्ग चढा था |

विधि ने क्या कल स्वर्ग गढा था ??

 

मैं यूँ ही चुपचाप खड़ा था |

गगन छोर पर चैन पड़ा था | |

घुल बूदों संग सतत बरसता |

तभी धरा कल स्वर्ग सा सच था | |

 

अवनी और अम्बर की लगी में, भरम सिसकता दूर पड़ा |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

नयनों के इस नरम कोर पर , फिर भी बूँदें क्यूँ आती थीं |

जब भीगा जीवन जग में था , क्यूँ कपोल पर ढल जाती थीं | |

घुल बारिश की बूंदों में ,सहसा कल यूँ ही खो जाती थीं |

अकुलाहट कुछ तो अजीब थी, क्यूँ यूँ ही तब रो जाती थीं | |

शायद नहीं मिला था उनको |

मीत भिगोने वाला पल में | |

अपना यूँ अस्तित्व मिटा कर |

रोती जाती थीं कल जल में | |

उन बूदों की उहापोह में, घुल जीवन का सत्व चला |

मटमैली बारिश की बातें, शायद मैं कुछ भूल चला | |

 

–उपेन्द्र दुबे

२८/०१/२०१२

 

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एक सांझ ….

कल पर्वत के पार वही, एक सूरज दौड़ा जाता था |

किरणों की चटकार गगन पर, सहसा छोड़ा जाता था | |

मातम का संगीत परिंदे, चिचिया कर दोहराते थे |

फड़फड़ की बेचैनी भी, पंखों में बसते जाते थे | |

क्यूँ उधार का रंग ओढ़, कल सांझ बहुत इठलाई थी ?

वो प्रहर भी तो ना बीत सका, जब रात दौड कर आई थी | |

रंगों की वो डली यहाँ कल, ऐसे लुटती जाती थी |

धूसर मेघों की श्यामलता, रंगों में सिमटाती  थी | |

दुल्हन सा माधुर्य लुटा था |

यौवन का चातुर्य छुटा था | |

धकियाती कल रात प्रवर थी |

अंधियारी वो बात प्रखर थी | |

उहापोह के आँगन में वो, किरणें क्यूँ सिसियाती थी ?

क्यूँ भविष्य भी वर्तमान में, मिलने को बौराती थी ? ?

क्यूँ मलिन पर्वत का सर, यूँ चमक लिए इतराता था ?

क्यूँ समीर यूँ शांत भाव से, बहते भी टकराता था ? ?

वन में वृक्षों की मस्ती भी, कोलाहल बन क्यूँ बिखरी थी ?

क्यूँ बदरी की बूंदों में, हालाहल घुल कर उतरी थी ?

कलकल निर्झर का गीत भी क्यूँ, क्रंदन अरुणोदित लगता था ?

क्यूँ पाहन तट के संबल बन, मन भी अनुमोदित करता था ? ?

स्वप्न साज बन क्यूँ प्रपंच, मन में  मादकता भरती थी ?

क्यूँ अकुलाती वो प्यास वहीँ, तट पर रहकर ना बुझती थी ? ?

कल रात वहीँ निर्झर तट पर, मैंने लहरों से बातें की |

गीले उस रेत के दामन में, कुछ आढ़ी तिरछी रेखा दी | |

वो चंद लकीरें मिल कर के, एक नन्हा खाका खिंच गयीं |

थी सुबह धुप की फिक्र किसे, वो तो थी अँखियाँ भींच गयीं | |

–उपेन्द्र दुबे

१३/०१/२०१२

 

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कैसी वो थी रात…..

कहीं दूर एक पल को, धडकन थमी थी |

कहीं रात सूरज की, किरणें जगीं थी | |

कहीं दूर चिड़ियों ने, छोड़ा बसेरा |

अंधेरों की चादर में, लिपटा  सबेरा | |

 

कहीं रात मद्धम सा, झोंका हवा का |

नयन छेड़ हौले से, खोला झरोखा | |

कहीं रात आँगन में, रुनझुन नुपुर की |

वो चुपके से आँचल थी, छू गयी किसी की | |

 

किसी की नरम सी, हथेली सी थी वो |

उसी पल को आई, सहेली सी थी वो | |

गुम थी ख्यालों में, वो खुशनुमा सी |

मीठी कहानी हो, जैसे सुनाती | |

 

कहीं रात निन्दियों ने, लोरी सुनाई |

नन्हे सुबह को, थपक कर जगाई | |

अंधेरों की गुनगुन थी, चांदी सी रातें |

बनी ख्वाब मन में, संजोने को बातें | |

 

कैसी वो थी रात, दिन को जगा गयी |

किसकी वो थी बात, सपने सजा गयी | |

चलो जिंदगी को, सबेरा बना लें |

उसी रात में अपनी, दुनिया बसा लें | |

मिले जिस डगर पर, सुबह सांझ तुमसे |

चलो उस डगर पर , घरोंदा सजा ले | |

 

 

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नवल धवल मंगलमय अर्पण …..

कल मेरे आँगन में पूरा,

चाँद अचानक आया था |

तारों के उस बड़े झुण्ड पर,

थोड़ा सा इठलाया था | |

मैंने कान पकड़ ली उसकी,

सोचा तुम्हे दिखाऊँगा |

पर देखो न आधा ही है,

कैसे तुम्हे रिझाऊंगा | |

कल तक बड़ा सलोना ही था,

चांदी सी ही चमक भी थी |

राह तुम्हारे चलते चलते,

कुछ मलिन सा लगा मुझे

मैंने नदी राह में देखि,

सोचा इसे यहीं धो लूँ !

ठंडी ठंडी रात भी थी , और ठंडा नदी का पानी था |

लगा कांपने छूते ही जल

मैंने सोचा धो लूँगा

पर वो धार नदी की सहसा,
तेज हुई ही जाती थी |

भागा जाता चाँद उसी पर ,

देख हुई हैरानी थी | |

झपट पकड़ मैंने उसको फिर ,

लोटे में नदी धार भरी ,

आधी धार उड़ेली उस पर ,

रगड़ रगड़ धोया मैंने ,

कुछ खँरोच भी आई मुख पर ,

जिसका दाग अभी तक है |

 

फिर पोंछा कुर्ते से अपने |

नन्हा चाँद भी लगा था हँसने  | |

चांदी सी उस नवल भोर का ,

बना लिफाफा खुद से ही ,

भरा चाँद के टुकड़े को और,

तारों की कुछ चमक भरी |

चलने लगा डगर पर अपने

झोले को काँधे पर रख

सच कहता हूँ पूस मांह की

सर्दी बड़ी निराली है

हाड़ कंपाती पुरवाई थी

पर लगती मतवाली है

रात स्याह की डगर खतम हुई

अब पहुंचा हूँ तुम तक मैं

नन्हा रवि भी झाँक रहा था

गगन स्वर्ण की खिडकी से

खोल लिफाफा बंद भोर का

चाँद हाथ में थाम लिया

पर आँखों में आंसू आ गये

देख उसे आभा विहीन

धुले हुए इस चाँद से अच्छा

भला था मेरा वो मलीन

हो रुआंस उस बाल सूर्य से

मुट्ठी भर किरणें मांगी

उस उधार की किरण मली

मैंने उस चंद के मुखड़े को

तब देता हूँ भेंट मैं तुमको

उसी चाँद के टुकड़े को

मधुबन में कोयल थी कूकी

आधी कुक मैं भर लाया

सोचा संग चाँद के दूंगा

पता नहीं तुमको भाया

मुझे पता है नहीं भायगा ,

धूसर सा भौंडा मुखडा

पर क्या करता नवल गगन में

मुझे मिला बस ये टुकड़ा

हर आगंतुक वर्ष चमक को

गया वर्ष सब खोता है

नए चाँद की हंसी को देखो

यही चाँद तो रोता है

उसी चमक का एक अंश

तुमको ये अर्पण करता है

नवजीवन को आज तुम्हारे

खुद का तर्पण करता है

अब छोडो अट्टी कट्टी

उठो आज अब मुंह धो लो

देखो नया ब्रह्मतल सारा

स्वागत को अकुलाया है

चलो चाँद को रौशन कर दे

नया वर्ष अब आया है

 

–उपेन्द्र दुबे(३१/१२/२०११)

अंबिकापुर से ….

 

 
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Posted by on दिसम्बर 31, 2011 in कविता [Poetry]

 

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मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा …

तुम भावों का उगता सूरज,

जन मानस पर छा जाती हो |

मैं खंडित मन का कवि मेरी,

पंक्ति बन तुम आ जाती हो | |

बनी लेखनी मन स्याही संग,

अक्षर की अवली बनती तुम |

चित्त पटल पर खाका खींचूं,

रेखा भी पहली बनती तुम | |

तुम रजनीगन्धा निशि क्षण तक,

सर सुगंध नभ धरा में भरती |

जाड़े की गुनगुनी धुप का,

आसव बन अनुपूरित करती | |

तुम मधुबन की पारिजात, मैं अपना ही परिहास लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | |

 

तुम दरिया की तेज धार मैं,

उथले जल का हूँ श्रींगार |

तुम उपवन की सघन छांव मैं,

मरुप्रदेश का लुटा गांव | |

नयनों में सपनों की छवि तुम,

मैं अश्रु बन कहीं ढलकता |

तुम अधरों की प्यास सकल हो,

मैं सूखी नद बना दरकता | |

तुम पूनम की सीत चांदनी,

दावानल की एक लपट मैं |

तुब पूरब की सूर्य रश्मि हो,

अश्तांचल की एक दहक मैं | |

तुम बसंत, स्वाति सम पावन, वर्णन मैं कई बार लिखूंगा  |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | | ……

 

तुम नंदन बगिया की देवी,

मैं झुरमुट बीहड़ उपवन का |

तुम चन्दन और मैं माटी हूँ,

तुम मधुबन, मैं शूल हूँ वन का | |

जब गति शांत बने अति निश्छल,

हलचल बन तुम आ जाती हो |

जेष्ठ माह की भरी दुपहरी,

पूर्ण मेघ बन छा जाती हो | |

बरस बनी अमृत धरती पर,

जीवन के नवरंग गिराती |

एक आश की बनी मंजरी,

सर तरंग बन कर इठलाती | |

तुम भावों की भरी गगरिया, मैं उनका मनुहार लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | | ……

 

तुम मूरत मन के मंदिर की,

मैं पत्थर एक नदी तीर का |

तुमने दर्द सहा पूजी गयी,

मैं क्या जानूं हाल पीर का | |

अंक तुम्हारे बन पुनीत,

मेरे मन हवन को पूरण कर दें |

प्रेम विनीत बने हर्षित हो,

ह्रदय भाव सब अर्पण कर दें | |

शाश्वत धवल पटल सम्मुख हो,

नयनों में कोई क्षोभ न हो |

कल जीवन की सांझ ढले जब,

अन्तः पर कोई बोझ न हो | |

तुम निधि जीवन सागर की हो, मैं जीवन संघर्ष लिखूंगा |

तुम शब्दों की शंखनाद, मैं पन्नों पर इतिहास लिखूंगा | |

 

–उपेन्द्र दुबे

 
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Posted by on दिसम्बर 25, 2011 in कविता [Poetry]

 

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एकाकी , तुम मेरे साथी…

एकाकी , तुम मेरे साथी,

बस यूँ ही बन कर रहना |

चलूँ छोड़ जब अपनी माटी,

हाथ पकड़ कर तुम चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

धागे जब विश्वास के टूटे,

आँगन  जब अधिकार के छूटे |

नाते जब बेमाने से हों,

अपने भी बेगाने से हों | |

मन की कोर पकड़ पगली सी,

कण कण में मेरे बसना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

अवरोहों का जाल बिछा हो,

जीवन पथ विकराल बना हो |

भाग्य सूर्य पर ग्रहण पड़े जब,

सखियाँ मेरी रूठ गयीं सब | |

पथराती  भी नेह अगर हो,

थकी देह और रुकी डगर हो |

लिए हाथ आशा का दीपक,

राह दिखाते संग चलना | |

एकाकी , तुम मेरे साथी..बस यूँ ही बन कर रहना…

चलूँ छोड़ जग का कोलाहल,

पी कर जब सारा हालाहल |

मधुबन जब वीरान बना हो ,

घर में भी शमशान बसा हो | |

राहों की जब धुल छिटक, माथे की तिलक बने निखरे |

पावनता जब ह्रदय गर्भ से, होकर के नीचे बिखरे | |

मेरा ‘मैं’ मुझसे छूटे जब, कुटिल दर्भ आलापों पर |

जीवन की संगिनी रूठे जब, झूठे व्यर्थ प्रलापों पर | |

तब जीवन की परिभाषा बन, उस प्रयाण तक तुम चलना |

एकाकी तुम मेरे साथी …बस यूँ हि बन कर रहना …..

–उपेन्द्र दुबे

 
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Posted by on दिसम्बर 24, 2011 in कविता [Poetry]

 

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तेरी मशखरी –और ये सर्दी …

तुने पलकें क्या झपकी ….मिजाज़ मौसम ने बदला
आँचल ने पवन क्या छेड़ा ….गली में हो गया बखेडा
तेरी साँसों की नमी ने, शकल कोहरे की ले ली है
कहता था यूँ मसखरी न कर, पुरवाई हड्डियों में कसकती है ,
पछुवा बनी पुरवाई , फंसी सर्दी में दिल्ली है

बहुत ठण्ड है रे बाबा …
–उपेन्द्र दुबे

 
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Posted by on दिसम्बर 18, 2011 in क्षणिकाएँ

 

एक सच ऐसा भी ….

बमुश्किल चार हाथ की खोली, घुने हुए बांस या सरकंडे से बनी जर्जर होती दीवारें , टिन – टप्पर से बनी हिलती डुलती छत, जिसे जलकुम्भी या खजूर के सूखे पत्तों से ढँक दिया गया है , ताकि गर्मी के चिलचिलाती धुप का असर शायद थोडा कम हो जाये | न कोई खिडकी न झरोखा , बस एक छोटा सा टटरी  से बना दरवाजा , जिसमे से कम से कम कमर तक झुक कर तो आया जाया जा सके |

खोली के सामने से जाती रेलवे की ब्राडगेज लाइन और पीछे गटर का मैन होल | खोली के आधे हिस्से में भरी शहर की नालियों या कूड़े करकट के ढेरों से इकट्ठा किये गए प्लास्टिक की थैलियों से फूटती सडांध व उनसे रिसते गंदे पानी से भीगते जमीन की सीलन | बचे हुए आधे हिस्से के एक कोने में चार छह पकी ईंटों से बना एक चूल्हा , जो की अगर सप्ताह में एक दिन जलता है तो अगले दो – तीन दिनों बाद भी जलेगा या नहीं …पता नहीं |

खोली के उसी हिस्से में खजूर या ताड़ की सुखी पत्तियों या धान की पुआल बिछा कर पड़े चार छह छोटे छोटे बच्चों के साथ दो जवान मर्द और औरत | लेकिन उनकी जवानी का परिहास उड़ाती उनकी शारीरिक काया , मानो अपरिहार्य विपन्नता से निर्मित परिस्थितियों में बुढ़ापा इतना सशक्त हो गया हो की समय से पहले ही दुर्बल हो चुके शरीर में मांस की कमी का फायदा उठा कर जगह जगह शारीरिक चमड़ी को धकेल कर , बहार झांकने का असफल प्रयास करती  हड्डियां और चमड़ियों पर असमय ही पड़ गयीं झुर्रियाँ जवानी पर उसके आधिपत्य का एहसास करा रही हों |

घासलेट की ढिबरी के मद्धम रौशनी में दिन काटता ये परिवार कभी आकस्मिक आग तो कभी प्राक्रतिक आपदा का शिकार होता ही रहता है |

यह दृश्य महानगरों में बसी झुग्गी बस्तियों में बड़ी आसानी से देखा जा सकता है , जहाँ हजारों खोलियों की कतारें बमुश्किल बलिश्त  भर की चौड़ी गली से बटीं  रहती हैं  और उनमे बसता है महानगरों का शायद सबसे बड़ा वर्ग, जहाँ नृत्य करती है गरीबी, अशिक्षा , बिमारी, सामाजिक  विसंगतियाँ , यौन उत्पीडन और घुटन | और भी न जाने कैसे कैसे पारिस्थितिक उपहार प्राप्त होते हैं इस वर्ग को , जिनमे से कुछ तो विरासत में मिले होते हैं इन्हें और कुछ के लिए जिम्मेदार होता है हमारा समाज , जिन्हें जीवन भर संजो के रखना या तो इनकी मजबूरी होती है , या इनके साथ किया गया भाग्य का क्रूर एवं सबसे घिनौना उपहास |

यही ऐसा शायद एकमात्र वर्ग होता है जिसके परिवार का प्रत्येक सदस्य जन्म से ही अपने पेट की आग बुझाने के लिए संघर्ष करता है | औरत , मर्द, बुढा , बच्चा और जवान , सभी का यदि कोई एकसूत्री कार्यक्रम होता है तो वो होता है “रोटी की तलाश |

बचपन बितता है गली कूंचों में मगर खेलते  कूदते नहीं,  बल्कि नालियों में बहते गंदे पानी में हाथ डुबो कर , कुछ ऐसी चीज़ की तलाश में जो जीविकोपार्जन में सहायक हो | नीचे सरकती चड्डी को एक हाँथ से संभाले और दूसरे हाँथ से प्लास्टिक के मैले कुचैले बोरे को अपने नंगे कन्धों पर टाँगे, नाक की सुरकन को सुर्र सुर्र ऊपर खींचते ८-१० साल की उम्र के १०-१२ बच्चों के ऐसे कितने समूह महानगरों की गलियों में पौ फटते ही दिखने लगते हैं | किसी के पेट में अनाज का २-४ दाना गया भी है तो किसी के वो भी नहीं | दिन की चढान के साथ जब क्षुधा ज्यादा ही सताने  लगी तो , किसी कूड़ेदान या किसी अभिजात वर्ग के घर के पिछवाड़े पड़े कचरे के ढेर में फेंकी गयी जूठन से पेट भर लिया |

न अल्हड़ता, न हंसी, न खुशी , अभावों की एक छोर थामे बीत गया बचपन | इस तरह ये बचपन से कब जवानी में प्रवेश कर जाते हैं , इन्हें खुद भी पता नहीं चलता | और जब पता चलता है तो शारीरिक और मानसिक दोनों रूप से परिवर्तित हो चुके होते हैं ये | परिपक्वता के अभाव से जूझती इन लड़के – लड़कियों की कच्ची उम्र कब इन्हें विसंगतियों के मध्य घसीट ले जाती है , इन्हें पता ही कहाँ चल पाता है | वो विसंगतियाँ इनके पहले से ही खोखली हो चुकी जिंदगी को घुन की तरह चट कर जाती हैं | कुत्सित जवानी से फिर अभिशप्त बुढापा और उसके बाद गुमनाम मौत , अर्थात जीवनलीला का समापन |बस इतनी सी ही जिंदगी होती है इनकी , और वही “आँगन भर धुप और खिड़की भर आकाश” का नाम “जीवन “होता है  इनके लिए |

न कोई सपना , न अरमान , न उद्देश्य कुछ भी तो नहीं होता इनके पास, अगर इनका अपना कुछ होता भी है तो वो होती है इनके जीने की मजबूरी | कितनी ही सरकारें आती हैं और चली जाती हैं, कितनी ही योजनाएं बनती हैं, कितने ही वायदे किये जाते हैं इनके साथ , किन्तु कुछ भी परिवर्तित नहीं होता इनके लिए , सबकुछ यथावत रहता है | हाँ अगर कुछ बदलता है तो वो ये की आज इनकी एक पीढ़ी तो कल दूसरी, परसों तीसरी, याने भोगने वाली पीढ़ीयां बदलती चली जाती हैं बस |

क्या देता है समाज इन्हें या क्या देते हैं इन्हें हम ?? हाँ अगर इन्हें कुछ मिल पाता है हमसे तो वो इनके बच्चों या जवान लड़कों  की गलतियों को देख कर हिकारत भरी नज़रों की चुभन , उपेक्षित जीवन , गन्दी और भद्दी गालियाँ  और ऐसी ही चीज़ें जो इनके जीवन को और ज्यादा विकृत कर सके | इनकी जवान लड़कियों की अधढकीं  देह को देख कर उस पर गड़ती  कामुक नज़रों की चुभन , उनकी मजबूर जवानी पर कसती फब्तियों से छलनी होता इनका ह्रदय , इनकी बहन बेटियों से किया जाने वाला भद्दा  मजाक और इन सब को देख कर उनका विरोध तक न कर पाने का आक्रोश और दर्द शायद इन्हें,  इनके कुत्सित जीवन जीने की मजबूरी से भी ज्यादा व्यथित करता होगा | इनका कुंठित और अभिशप्त जीवन कितना ह्रदय विदारक होता है इसकी परिकल्पना तक नहीं कर पाते हैं हम |

या यूँ  कहना की सोचना ही नहीं चाहते हैं हम इनके बारे में , तो कोई अतिशयोक्ति नहीं होगी |  इनकी गलतियों पर मीनमेख निकालता  हमारा समाज , काश उन  परिस्थितियों के बारे में विचार करता , जो इनमे विकार पैदा करते हैं या इनको दूर करने की जरा सी भी कोशिश करता तो शायद इनका जीवन स्तर इतना बदतर तो नहीं होता |

क्या हम इतना भी नहीं कर सकते की हमारे द्वारा दिया गया थोडा सा प्यार , थोड़ी सी सहायता और थोडा सा ही उत्साहवर्धन इनमे जीने की ललक , कुछ कर दिखाने की चाहत , जीवन का उद्देश्य और एक जिम्मेदार सामाजिक प्राणी होने का एहसास पैदा कर सके | यदि हमारे द्वारा दी गयी थोड़ी थोड़ी चीज़ें , इनमे जीवन के बड़े बड़े एहसास पैदा कर सकें तो यह उनके नारकीय जीवन से उन्हें उबारने की दिशा में एक सकारात्मक एवं सराहनीय कदम होगा और इसके बदले में हम निश्चय ही आत्मसंतुष्टि की एक अमूल्य निधि का उपहार प्राप्त कर सकेंगे |

विकास पथ पर अग्रसर हमारे भारत की सारी उपलब्धियां निश्चय ही अधूरी होंगी बिना इनकी स्थितियों में सुधार के | इसको पढकर आपमें भी उनके जीवन की मार्मिक स्थितियों का एक छोटा सा एहसास तो निश्चय ही पैदा हुआ होगा यह मेरा विश्वास है | लेकिन आपसे मेरी एक करबद्ध प्रार्थना यह है की जीवन के किसी मोड पर यदि कोई ऐसा अवसर आये की आप इनके उत्थान के लिए कुछ कर सकें तो ऐसा जरूर कीजियेगा , ताकि इनके जीवन में  भी थोडा सा प्यार , थोडा सा स्वाभिमान और थोड़ी सी इज्ज़त इन्हें मिल सके |

और मरते समय उन हाथों का स्पर्श मिल सके जो की कम से कम उन्हें अपनेपन  का एहसास तो दिलाए और इनके कपोलों पर उस समय ढलकती आंसुओं की दो बूंदों में थोड़ी सी संतुष्टि और खुशी का भाव हो , जिस से फिर से यहाँ आने की ललक का संचरण हो सके इनमे | यही हमारे द्वारा दी गयी लोकहित में सबसे बड़ी श्रधांजलि होगी |

क्यूंकि अभावों से तो लड़ा भी जा सकता है किन्तु कोई अपनी ही मानसिक कुंठा , और ह्रदय में बसे दर्द से कब तक लड़ पायेगा जो की जीवन की परिपूर्णता के बाद भी जीवन्तता को ही दूषित कर देती हैं |

–उपेन्द्र दुबे

 
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Posted by on दिसम्बर 18, 2011 in लेख [Articles]

 

कहते हैं सब खतम हो गया …पर यादें तो चलती हैं….

अरमान दिलों के टूटे तो, पैबंद कहाँ लग पाता है

मुट्ठी में बंद समंदर हो, अनुबंध कहाँ लग पाता है

शर्तों पर गर जीना ही है, तो सपनों की मुस्कान कहाँ

जब जज्बातों की चिता जले , तब मन पाता विश्राम कहाँ

 

रिश्तों के उपवन में मैं भी, बन भ्रमर कभी गूंजा करता

मधुबन मकरंद लिए दिल में , बस गीतों में झूमा करता

अब साज ही जब सब टूट गया , बातें महफ़िल की मौन कहाँ

जब राज दिलों से फूटा हो, रिश्तों का अब फिर यौन कहाँ

 

संबंधों की तरुणाई गयी,

बातें भी बिसरी आई गयी

वो वहीँ रुके

हम दूर दिखे

पल दिन और माह बरस बीते

इसी राह पर पलभर को , कल मुड़कर जब पीछे देखा

वो यादें दौडी आती थी, उन लम्हों की गरमाहट ले

तभी कसक उठती दिल में, आँचल की वो नरमाहट ले

एक प्रश्न सहज कौंधा मन में

क्यूँ वक्त ने यूँ रौंदा क्षण में

अपने आँगन की मिटटी में

क्यूँ काँटों की सौगात बुनी

उपवन जब सम्मुख बैठा था

क्यूँ उसरता अनजान चुनी

दहलीज पे बैठा मन अब भी

प्रतिपल ये सोचा करता है

राहों पर उडती धूलों में अब तक वो ढूँढा करता है

चलने की आपाधापी में कुछ छूट बहुत पीछे जाती है

बारिश की बूँदें बरस के ज्यूँ बदरी में बाकी रह जाती हैं

कहते हैं सब खतम हो गया

पर यादें तो चलती हैं

और कभी कभी उन लम्हों को इन लम्हों के संग ले आती हैं

कभी कभी उन लम्हों को इन लम्हों के संग ले आती हैं…..

 

–उपेन्द्र दुबे

 
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Posted by on दिसम्बर 17, 2011 in कविता [Poetry]

 

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टूटी कलम …और सूखती स्याही …

किस्तों पे चलती दुनिया में,

जब रिश्तों के बाज़ार सजे |

अश्कों में जो डूबा घर हो,

और रश्कों पर परवान चढ़े | |

जब चंद स्वार्थ के सिक्कों पर,

ममता का मूल्य सिहरता हो  |

शिशुपान को उठते आँचल पर ,

रावन का हाथ लहरता हो  | |

मनुहार अकारण अबला सी, पुरवधू बनी फिर सजती है |

अनुनय फिर कुलटा बनी गली, हर पग के तले  कुचलती है | |

अरमानों को कंधे मिलते ,

पैमानों में लिपटे चलते |

ठोकर जीवन की ताल लगे ,

मधुमास उम्र भूचाल लगे | |

यौवन अलसाई पड़ी फिरती |

निःशक्त अशक्त बनी ढलती | |

सपनों के टुकड़े गलियों में, जब ठोकर खाने लगते हैं |

तब मधुशाला फिर मंडप बन, शुभ गीत सुनाने लगते हैं | |

छलके मदिरा फिर प्याली में ,

मदभरी रात की क्यारी में |

किन्तु न अकारण ऐसे ही ,

मन मतवाला हो जाता है |

ये वक्त है जो इंसान नहीं ,

हर गान की तान बनाता है | |

मजबूर सुरा जब दुबकी हो ,

ग़मगीन ग़मों से लिपटी हो |

मतवारी रात न मद में हो ,

अंधियार भी बैरन हद में हो |

तब मादकता खिशियती है ,

मधु मंडप भी सिसियती है | |

जब प्रेम सुधा मदिरा बन कर, शापित तर्पण करवाती है |

मनु माधव दानव बन फिरता, मरजाद दफ़न करवाती है | |

तब हर नगरी लंका बनती , अपनी विनाश लीला बुनती |

तब अधोगमन का साक्षी बन, कुलभूषण दीप बुझाता है | |

और कालचक्र की धुरी से पन्नों पर अक्षर आता है ……

-उपेन्द्र दुबे

 
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Posted by on दिसम्बर 10, 2011 in कविता [Poetry]

 

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